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वही कहानी

बस वही पुरानी सुनसान राहें थी,
था बस वही खालीपन और कड़कती धूप।।

एक उसका ही साया बचा था,
भस्म हो चुका था जीवन का हर रुप।
कदम थके थे और पैरों में पड़े थे छाले,
फिर भी नजर नहीं आता था हमसाया स्वरूप।
काली-सफेद हो चुकी झुलसकर सब दिशाएँ,
बस एक बरसात की चाह में दुआएँ भी की थी खूब।
फिर भी बस वही पुरानी सुनसान राहें थी,
था बस वही खालीपन और कड़कती धूप।।

सोचा हर बार चलो करते हैं फिर नया आगाज,
नए सुरों से सजाते हैं फिर से एक नया साज।
खुद को हर बार दोहराने से, पर होनी ना आई बाज,
हर बार वही गलियारे क्यूँ मिलते हैं, ना समझे राज।।
बहुत सजाई उम्मीदें फिर भी हालात रहे वैसे ही कुरूप,
और बस वही पुरानी सुनसान राहें थी,
था बस वही खालीपन और कड़कती धूप।।

बेजान हो चुके जज्बातों में डालने में लगे रहे जान,
पर फरिश्ता बनने की चाह में बनते गए शैतान।
एकरंगी जीवन में औरों के इंद्रधनुष देखकर हुए हैरान,
हर बार की नाकामियों में ढूँढते रह गए जीत के निशान।।
रेत के महलों सा ढहता देखा हर सपना खूब,
बस वही पुरानी सुनसान राहें थी,
था बस वही खालीपन और कड़कती धूप।।

बरसात का त्यौहार

ये बादलों के नीले पहाङ,
जो आसमान के हैं उस पार।
पुकारते हैं हमें कि देखो,
प्रकृति ने किया फिर से हार-श्रृंगार।।

छाई पेङों पर नई हरियाली,
जब आया बरसात का त्यौहार।
झमाझम बरसते हैं मेघ ऐसे,
 कि छा गई है हर ओर बहार।।

हर जीव को मिला नवजीवन,
गाए धरा का कण-कण राग मल्हार।
धुल गई अशुद्धियाँ सारी,
हुई धरती माँ नवयौवन से सरोबार।।

कभी मक्खन समेटे अपने में ये गगन,
तो कभी लाता काली घटाओं के वार।
निचुङती गरमी से दिलाने निजात,
देखो आया सावन का कहार।।

भांत-भांत की सजीवटता झलकती,
नजर आता जीवन का असीमित सार।
मुरझाए फूल भी खिल उठे तब,
जब आसमान से हुई बूँदों की बौछार।।

मीठे-तीखे पकवान भाते,
हवाओं में बहता एक नशीला खुमार।
नीरस, बेरंग से होते क्षणों में ,
अचानक सज जाते रंग बेशुमार।।

टप-टप कर टपकते तन के पानी का,
बारिशें उतारने आई तन का चिपचिपा भार।
खिल उठा हर रुप धरा का,
देखो जब आया बरसात का त्यौहार।।















































जीवन की डगर


कभी-कभी हमारी जिंदगी में ऐसा भी कुछ होता है,
हो जाते हैं अपने हमसे दूर और ये दिल रोता है।

हम लग जाते हैं खुद को समेटने और ये वक्त भाग जाता है,
करें भी क्या इस हालात में ,कुछ समझ भी नहीं आता है।

खो जाता है जीवन कहीं, मुस्काना याद भी नहीं आता है,
धकेलते रहते हैं जीवन की गाङी, जो उदासी से भर जाता है।

इसी धक्कम-पेल में कहानियां सब खो जाएँगी,
खुशियाँ होंगी इतनी,गिनना शुरु करते ही खत्म हो जाएँगी।

जिसने दिए हैं कष्ट हमें, वो ही तो इनसे उबारेगा,
समस्याओं को झेलते हुए ही तो सही रास्ता नजर आएगा ।

समय की जिम्मेदारी को जबरदस्ती अपने ऊपर लाद रहे हैं,
दुखों से भर लिया है मन,सुख इनके कारण भाग रहे हैं।

छोङ दो चिन्ताएँ उनके लिए,जिसने ये पैदा की हैं,
लगता है जीने की बस एक यही राह सही है।

मस्तियों में गुजारें हर पल, ये फिर ना मिलेगा,
मुश्किलों से ही तो, जीवन का हर रंग खिलेगा।

जानते हैं नहीं ये काम इतना आसान,
हमेशा अधर में लटकती रहती है नन्ही जान।

भले ही बीते वक्त को कभी ना भुलाएँ,
पर उसकी वजह से अपना आज तो ना जलाएँ।।

मातृभाषा का दर्द

फिर से उठी है हुक उसके दिल में,
                                 और छलका है आँखों से पानी।
जानती है अच्छे से हर रोज की,
                                अपने बच्चों की मनचाही नादानी।।

गैरों से भला क्या होता है शिकवा,
                               अपनो ने ही तो पैरों तले रौंदा है,
हमेशा की तरह हर घाव पर,
                               उसके दिल में एक ही सवाल कौंधा है।।

क्यूँ अपनी ही मातृभाषा को,
                               नहीं पहचान रही उसकी ही औलाद।
अधुरी आधुनिकता से चुँधियाई,
                               संतानें नहीं सुनती उसकी फरियाद।।

अभिजात्य कहलाने के चक्कर में,
                               सब भूल गए अपनी ही ज़बानी।
अपनी ही भाषा को कर डाला रुसवा,
                              और हो गया हर रिश्ता बेमानी ।।

क्या है तेरे होने में कमी,
                             जो तिरस्कार किया सबने तेरा।
हर कदम पर बदला खुद को इसने,
                            पर ना बसा सकी हमारे दिल में डेरा।।

क्या गलती है इसकी कोई बताए तो जरा,
                            जो उतार दिया सबने अपनी जुबां से।
ओह! हैं हम तो विकासशील,
                            इसके साथ विकसित बन सकेंगे कहाँ से?

स्थापित होना है ना हमको,
                            इसलिए दूसरों की जुबां होनी जरुरी है।
पर समझ लो इतना,
                           जड़ से कटकर पेड़ का फलना कल्पना कोरी है।।

हाय! अब तो छोड़ दी वो उम्मीद,
                            छिपा देती हैं जिन्हें निरादर की बदली।
हे भारत! तेरी ये हिन्दी,
                             भाल की बिन्दी अब पड़ गई धुँधली।।

जीवन-चक्र

ना खुशी का फव्वारा फूटा है,
ना गम की गहराई बढी है।
चढ रहे थे जिस दृढ संयम पर,
हाँ, उसकी स्वस्थ मानसिकता घटी है।
हम तो नहीं बनना चाहते ऐसे,
जिसने प्रभाव की चाहत गढी है ।
उन ख्वाबों की दुनिया में गुम हुए,
जिनके आधार की ही नींव कटी है।
बेसिर-पैर की उम्मीदों ने लगता है,
हमारे दिल की कमियाँ सारी पढी हैं।
पर
 देखो ये क्या हुआ??

बदल गई है ये जिंदगानी,
खत्म हो गई वो कहानी।
जिसने कभी हलचल मचाई थी
हर जीवन की दरिया में,
हैरान कर जाता है,
जीवन का हर ऐसा ही पल,
नहीं जान पाता कोई, क्या था ये,
जो लम्हा बीता था इस जीवन का।
असमंजस में फंस जाते हैं सब,
कुछ भी नहीं आता है समझ में,
कशमकश क्या थी वो जिंदगी,
नहीं समझ पाते कब तक हम ये।।

आईना


वो आईना जो धुँधला-सा पड़ा है कोने में,
दिखता नहीं कुछ, फर्क नहीं होने या ना होने में।

वो जो कुछ पुरानी किताबें थी,
  उनको मैंने जो अनजाने में उठाया,
    जो पुरानी बातें छिपी थी पन्नों के बीच,
       याद करके वो आज फिर दिल भर आया।

लहर-लहर झिंझोड़ा मुझको यादों ने,
   तब दिल ने बेकल होकर फरमाया,
     चल धूल झाड़ते हैं उस आईने की,
        सन्न रह गई देखकर जो नजर आया।


ये कौन है संजीदा औरत सी?
  मैं तो चुलबुली लड़की थी!
    हवाओं सी उड़ती-फिरती थी,
      शिकन को देती झिड़की थी।

ठहाके मारकर हँसती, दहाडें मारकर रोती थी,
  बंद दीवारों में ठंडी हवा के झोंके लाती खिड़की थी,
    अब होंठ सिले हुए, हाथ-पैरों में बेड़ियां थी,
       पहले कुछ गलत लगता तो, तुरंत लड़-भिड़ती थी।

कुछ सुई सी चुभने लगी है अब सीने में,
  अंदर ही फूट पड़ी रुलाई, कैसा ये अहसास?
     भावशून्य है अब व्यक्तित्व मेरा,
        बचा नहीं कुछ मुझ में खास।

जिम्मेदारियों के नाम पर मिली दम-घोंटू जकड़न,
  टूटे-बिखरे सपनों पर से गुजरती, मैं हो गई हूँ बदहवास,
     खुलकर जीना चाहूँ तो तमगा मिले बिगङैल का,
        मशीन-सा हुक्म बजाती जाऊँ, तो सब कहें शाबास।

मैं भी जिंदा हूँ, आईने ने तोङा ये भ्रमजाल,
  समय-नियम से चलने वाली हूँ मैं जिंदा लाश,
     यूँही जीवन काट देती, होकर बेदम, बेहाल,
        हटाती ना मैं आईने की जो ये धुल, काश!

अब जाग गई हूँ, नाउम्मीदी की निद्रा से क्योंकि,
  सबके ईशारों पर नाचकर भी कुछ नहीं मेरे पास,
     काटना नहीं वक्त ,अब तो हर पल को जीना है,
       बुरे तो बन चुके, अब कैसी है फूलों की आस।

जीवन भर पिसते रहे, फिर भी रहे जाहिल और नामुराद
    ताउम्र ताने मिले, अब क्या गम होगा खोने में,
      वो आईना जो धूँधला सा पङा था कोने में,
          दिख गया सब, फर्क भी है उसके होने ना होने में।। 



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