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अंत

क्या ये अंत बस यूँही होगा?
ना आँखें नम होंगी,
ना ही रोया जाएगा,
ना गले मिला जाएगा,
ना मुड़ कर देखा जाएगा,
 ना दुआएँ की जाएँगी ,
ना हाथों का स्पर्श दूर होगा,
ना रोकने को हाथ उठेंगे,
ना ही पुकारा जाएगा,
ना बिछड़ने का दर्द दिखेगा,
पर क्या सच में ऐसा मोड़ भी आएगा?
और क्या ये अंत बस यूँही होगा?

क्या यही सच है,
दिल तो रो रहा है,
आँखें नम नहीं तो क्या !
चेहरा रुआँसा नहीं तो क्या !
दिल तो दिल को जकड़े बैठा है,
बदन गले ना मिले तो क्या !
जान भी संग उसके निकले जा रही है,
रोकने को हाथ ना उठे तो क्या !
अंदर-अंदर सब कुछ छिन रहा है,
हाथों के स्पर्श ना छूटे तो क्या !
दहाडें मारकर रो रहा है मन,
गर रोकने को पुकारा नहीं तो क्या !
छलनी हुआ जाता है सीने में कुछ,
जो बिगड़ने का दर्द नहीं दिखा तो क्या !
सच वो नहीं जो दिखा नहीं,
बेदम हुआ जाता है मन तो,
तन पैरों पर खड़ा है तो क्या !
तो फिर क्या ये अंत बस यूँही होगा?

दिल का दर्द

खामोशियाँ ये मेरी जले जा रही हैं,
तन्हाईयाँ यादों मे तेरी बहे जा रही हैं।
पूछूँ मैं जो तुझसे ए खुदा??
कसूर क्या था मेरा तू ये तो बता..!!
हर कदम बढा मेरा तेरी मर्जी से,
फिर सपने मेरे तार-तार हुए क्यूँ यूँ बेदर्दी से ??
दिल टूटा मेरा हर ख्वाब की लाश पर,
कहाँ है तेरा चमत्कार मेरे इस मोहपाश पर।
अरमानों के कफन ओढते-ओढते हुआ मुझे ये अहसास,
होनी के हाथों बेदम हैं सब, क्या करुँ मैं किसी से आस।
तङप की बेङियों में जकङकर जीवन मेरा यहीं मरा पङा है,
हँसी आती है अस्तित्व पर,हर कोई बेबस सबसे बङा है।
हाय ! कोई इस बोझ से दिला दे, काश मुझको मुक्ति,
उम्मीदों की लाश ढोने की नहीं मुझमे अब शक्ति।।

कसक दिल की


सूखी झाङियों के झुरमुटों सी ये मेरी जिंदगी,
बहार जो आ भी गई तो काँटों की सौगात ही देगी।।

चाहतों की फुहारें हों या महोब्बतों की बहार,
मेरी तो खैर हर चाहत होती रही है बेजार।
गर मेहरबान हो जाए तकदीर भी तो क्या
सपने ही जल गए सारे,पूरे होंगे भी तो क्या
भला घावों पर नमकीन बारिशें कब राहतें देंगी,
सूखी झाङियों के झुरमुटों सी ये मेरी जिंदगी।
बहार जो आ भी गई तो काँटों की सौगात ही देगी।।

कितना तलाशा तेरा वजूद, ए ईश्क मेरे जहाँ में,
ना मालूम था हम तो हैं आवारा तेरी निगाह में।
रुसवाईयों की दुत्कार मिली इतनी तेरे दरो-दिवार से,
कि सब्र भी हार गया सदियों से इम्तहान लेते इंतजार से।
उजङी अहसासों की जन्नत,आहटें भी तरंगें ना जगा सकेंगी,
सूखी झाङियों के झुरमुटों सी ये मेरी जिंदगी।
बहार जो आ भी गई तो काँटों की सौगात ही देगी।।

पीते रहे जीते रहे, तकलीफों के दर्दे-जहर,
फिर भी कम नहीं होते लकीरों के ये कहर ।
क्या करें उम्मीदें,नाउम्मीदी से है अब याराना,
महफिलों से सजी दुनिया, मेरा आशियाँ है वीराना।
खुशियों की शहनाई, अब मातम का अहसास देंगी,
सूखी झाङियों के झुरमुटों सी ये मेरी जिंदगी।
बहार जो आ भी गई तो काँटों की सौगात ही देगी।।

गुमसुम नजरें

शून्य की ओर ताकती ये नजरें गुम सी हो जाती हैं।
सब गुजरता तो है इनके सामने से पर ये देख कहाँ पाती हैं।।
उस एक  चेहरे को देखने की लालसा से ये यूँ ही भावशून्य हो जाती हैं।
दिल की उस कसक की कभी झलक भी नहीं दिखाती हैं।।
पर तन्हाई में उस तङप को जलते अश्कों संग बहाती हैं।
मंजिल नहीं है जिन राहों की क्यूँ उन्ही को तकते जाती हैं।।
उजङ चुके उस वीराने में एक साये को देखना चाहती हैं।
जबकी तकदीर की रूसवाईयाँ रोज इसे गले लगाती हैं।।
हकीकत भी दिए जख्म पर नमक ही बार-बार लगाती है।
ये भी जानती हैं अब ना होगा वो जो रातें उसे दिखाती हैं।।
हर कदम पर टूट-टूट कर एक ही चाहत उसे रुलाती है ।
यूँही तेरे इंतजार में एक दिन चुपचाप बंद हो जाना चाहती हैं।।
बस तेरे इंतजार में एक दिन चुपचाप बंद हो जाना चाहती हैं।।

एक विरह- मुलाकात

तुमसे मिलने के नाम पर ना हुई थी कोई हलचल,
ना खुशी थी, ना गम था, ना भारी हो रहा था पल-पल।
             पर जब तेरे पास होने का हुआ मुझे अहसास,
                तब होने लगी धङकने बेतरतीब और बदहवाश,
                सपना ना हो ये, बस कर रही थी यही अरदास,
            सोचा देखकर तुमको कैसे सँभालूँगी होशो-हवास।।

आँखों ने नही मेरे दिल ने तुझे पहचाना था,
तुम्हे प्रत्यक्ष देखकर ही हकीकत को माना था,
उस वक्त मेरा अस्तित्व मुझसे ही अन्जाना था,
उसे देखते ही नजरें बदली, जिसे गले से लगाना था।।

तुम तो वही थे दिखाई दिया तुम्हारा वही प्यार,
पर मैं कही खो गई थी होकर बेइंतहा बेकरार,
छुप-छुप, प्यार भरी नजरों से देखा तुझे बार-बार,
पर निष्ठुरता के मुखौटे से होने ना दिया इजहार।।

कितनी बेदर्दी से मैने खुद को था मारा,
नजरअंदाज किया उसे जो था खुद से भी प्यारा,
बिछुङनेे के नाम से रुँध गया था गला बेचारा,
खा ना पाई कुछ तभी तो था बहाना मारा।।

मन कह रहा था क्यूँ आई? भाग जाऊँ मैं यहाँ से,
पर कितनी तङप उठी थी जुदा होने के नाम से ,
तुम भी तो कितने बेचैन हो गए थे इस अहसास से,
धरती में समा जाती, अच्छा था, उस प्यास से।।

तुझसे दूर होते वक्त हो गई थी मैं पत्थर,
जल कर, भस्म हो गया सब, तुझे जाता देखकर,
कितना प्यार था, जो जतलाया तुमने, आखिरी अलविदा कहकर,
तुझे कभी अपने प्यार का अहसास ना करा सकी चाहकर।।

चुपचाप आ गई थी मैं छोङकर पीछे अपनी जिंदगी,
खुद से ज्यादा चाहा तुझको पर कर ना सके तुम्हारी बंदगी, मर भी नही सकती, ऊपरवाले देखकर तेरी ऐसी दरिंदगी,
निर्दोष होकर सबकुछ छिन जाने की साथ जाएगी ये शर्मिंदगी।।




दिल का टूटा हिस्सा

मेरे दिल का वो हिस्सा,
जो तकदीर की बलिवेदी पर जख्मी पङा है।
इस क्रूर समझौते की घुटन से,
जो हर पल बेचैन होकर तङप रहा है।
उस टूटे हुए हिस्से को मैंने,
फेंक दिया है किसी अंधेरे कोने में।
पर ओढकर निष्ठुरता की चादर भी,
 प्रश्नचिन्ह लगा ना सकी उसके होने में।।
पर फिर भी भींच ली आँखें,
और कानोे पर रख दिए हाथ,
ताकि दिखाई ना दे उसके जख्म,
और सुने ना सिसकियों का आतर्नाद।।
या तो संभल जाएगा खुद ही,
या इस दर्द के हाथों बेदर्दी से कत्ल हो जाएगा।
छोङ दिया है उसको लावारिस,
पर क्या टूटा हिस्सा जुङ पाएगा?
ये क्या सोच रही हूँ मैं?
होता नहीं कभी ऐसा चमत्कार,
कि मरने वाला जी उठे,
और टूटे टुकङों की जुङ जाए दरार।।
उस हिस्से को जब भी छुआ,
तो एक असहनीय पीङ से मरी जाती हूँ,
इसीलिए तो बनकर पत्थर,
उसको अंधेरे कोने में ही छोङकर चली आती हूँ।।

अधुरा सफर

ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी,
फिर क्यूँ मिली थी यूँ तकदीरें हमारी ?
      सूनापन छोङ के गए तुम जीवन में,
        तङप और बेबसी बची बस दिल में।
         सहा ना जाए हर गुजरता पल हाय!
          सूख गए आँसु, दिन-रात जो हैं बहाए।
            इस निष्ठुरता ने मार डाली मासूमियत सारी,
            ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

मरने लगी हैं अब तो सारी ही उमंगे,
 डूब गए हम तो, थम गई हैं तरंगे।
   माना मिली हैं मुझको नई मंजिलें,
     पर थमते क्यूँ नही चाहतों के ये सिलसिले ?
       मेरी हर राह पर पङ रही तेरी यादें भारी,
       ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

पहले जब हर आहट पर होती थी उम्मीदें,
  अब वक्त ने बना दी हैं उनके दरमियाँ सरहदें।
    तो क्यूँ तेरी निशानियाँ ये वक्त ना मिटा पाया ?
     और जब भी झाँका दिल में तू ही तो मिला है समाया।
        तेरे लिए इस प्यार को कैसे करूँ तुझपे बलिहारी ?
        ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

मेरी धङकनों में अब भी तुम जी रहे,
 हर एक पल मेरे तेरे बिछोह की पीङ पी रहे।
  क्यूँ वो रास्ते एक हो गए थे हमारे ?
    जब हम हैं एक ही नदिया के दो किनारे।
     फिर कैसे एक हो गई थी चाहतें हमारी ?
       ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।
      
फिर क्यूँ मिली थी यूँ तकदीरें हमारी ?

भीगी मुस्कान

















उम्मीद है कि कोई तो आहट हो
तेरी आवाज की कोई तो सुगबुगाहट हो,
इस बार तिल-तिल टूटती चाहतों का दंश ना झेल पाएँगे
इसीलिए चाहते हैं तेरे आने पर ही ख्वाबों की सजावट हो।।
पल-पल हो रहा है भारी बिन तेरे
ये डर ए खुदा! बस केवल घबराहट हो,
दिल को सजा दी है तब तक तेरा दीदारे-लज्जत ना करने की
कि जब तक मेरे दरो-दीवार पर ना तेरी कोई आहट हो।।
तू पुछे इक दिन कि आखिर बात क्या है?
इस सवाल में हक हो ना कि बनावट हो,
आए मेरी चौखट पर तु मुझे अपना बनाने को
काश! मेरी जिंदगी मे कभी वो भीगी मुस्कराहट हो।।

रुख-ए-महोब्बत












 ताउम्र जिंदा रहेंगी
                    तेरी महोब्बतें इन आँखों में,
पर अब कभी ये जिद्दी आँखें
                    तेरा दीदार ना करेंगी।
रुसवाईयां ना मिली कभी
                  तो ना मिली कभी वफा,
तेरी छाया पर भी मेरी सदाएँ,
                 हके-इजहार ना करेंगी।
घूँट-घूँट पीया था तुझे
                 मेरी रुह ने इस कदर,
कि श्मशान की आग भी
                 तुझे मुझसे बेजार ना करेंगी।
 तुझसे जुदा होकर
                पल-पल जलें हैं बेतहाशा,
पर फिर ये निगाहें
              कभी तेरा इंतजार ना करेंगी।
टुकङे-टुकङे टुट गई
              बिखरकर उम्मीदें सारी
कि अब किसी पर मेरी आहें
               यूँही ऐतबार ना करेंगी।।
जिंदा हूँ पर जीना कहाँ है,
                 टूटा हर ख्वाब ऐसे,
कि जन्नत की दरो-दिवार भी,
                    अब बेकरार ना करेंगी।।
और अब किसी पर मेरी आहें
               यूँही ऐतबार ना करेंगी।।

 

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