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दौङ

वो दौङा बेतहाशा था,
जाने किस बात पर रुआँसा था।
आजमाए थे हर मालूम जोर उसने,
पर हार का ही होता खुलासा था।।

सुना था कहते हुए ये उसने,
जीवन उत्सवों का नाम है।
नाकामयाबी दिखाती है कामयाबी की डगर,
उसकी कोशिशों में फिर क्यूँ नजर आती थकान है।।
अश्क बहाए हर दफा उसने इतने।
फिर भी नजर आता सब धुँधला सा था,
वो दौङा बेतहाशा था,
जाने किस बात पर रुआँसा था।

सुनी थी उसने कितनी ही कहानियाँ,
गिर-गिर कर दौङने के कारनामों की।
कुदरत भी देती साथ, जो करता है अनथक प्रयास,
सफलता चूमती कदम, जरुरत नहीं बहानों की।।
वो क्यूँ लङखङा उठता, जब गिर कर उठाता कदम,
क्यूँ फिर उसकी मंजिलों पर छाया कुहाँसा था।
वो दौङा बेतहाशा था,
जाने किस बात पर रुआँसा था।

जब हर बार सपना हुआ चूर-चूर,
तो सोचा चल कुछ देर अब ठहर जाते हैं।
हर प्रयत्न हो गया है अनमना सा,
क्यूँ ना धरा के संग ही बह जाते हैं।।
पर मौत आने से पहले ही क्या मरना,
कोशिशें करते रहने का नाम ही तो आशा था।
वो फिर दौङा बेतहाशा था,
चाहे कितना भी रुआँसा था।।

उङान

छूने को अपना आसमान,
   भर ले रे अकेले ही उङान।
     माना ना है कोई संगी-साथी तेरा,
       ना ही है कोई तेरी पहचान।।

जो बेआबरु हो चले हो हर दर से,
   तो बना दो अपना एक जहान।
     मिली हमेशा जो समझौतों की दुत्कार,
       तो बन जा अब खुद ही अपना मान।।

घुट-घुट कर जीते रहे सारी उम्र,
   फिर भी साबित ना कर पाए अपना ईमान।
     है तू तो सितारा-ए-गर्दिश,
       लगे हैं होने पर सवालिया निशान।।

मिलेगा हर सवाल को जवाब,
   होगा जब तेरी कामयाबियों का बखान।
      हैं हँसी के पात्र जिनके लिए आज,
         कल को वो बताएँगे अपना अभिमान।।

माना गिरे नजरों से, मिली जो हर बार हार,
    तिरस्कार भरी नजरों में भी झलकेगा सम्मान।
      माना गुनेहगार है तेरी सोच आज,
         कल उसी हर बात पर होगा सबको गुमान।।

धिक्कारने वाले तुझे आज,
    कहकर पुकारेंगे कल महान।
      छूने को अपना आसमान ,
         बस एक बार फिर भर तो सही अकेले ही उङान।।

माना ना है कोई संगी-साथी तेरा,
होगी एक दिन तेरी भी एक पहचान।।


राहे-गुजर

खैर मंजिल तो तय हो ही चुकी है,
अब तो देखना है राहे-गुजर क्या होगा।।
कहते हैं लोग जालिम है दुनिया बङी,
पर कम से कम ये गम तो ना होगा
कि अपनों ने ही दिया धोखा।।

बेइंतहा दर्द से जब तङप रहा था दिल
तो भगवान ने कहा- मत रो अंशात्मा,
मुस्करा तेरी गलियों मे अब ना कोई रोङा होगा।।

चाहे-अनचाहे जो दुखाया होगा दिलों को,
बेबसी और मजबूरियों में गुजारा था लम्हों को,
कह रहे हैं- होने वाला है इम्तिहान पूरा ,
लगता है सजा पूरी होने का वक्त होगा।।

जिस ख्याल से ही दहल उठता था दिल,
किया हर समझौता और रोए तिल-तिल,
जब हकीकत बना तो काफूर हुआ सब डर,
अब तो बर्बादियों में ही तो जश्न होगा।
रब ने ही तो जो ये राहे-गुजर चुना होगा।।

मिन्नतों से तो जिल्लतें ही हुई हासिल,
कठिन मिली राहें, क्योंकि हम हैं काबिल,
दर दर भटकना तो लहरें हैं साहिल की,
अब तो ठोकरों में भी अजब सा शबाब होगा।।

तकदीर ने ढाए जब हजारों सितम,
तो रब ने कानों में फुसफुसाई ये नज्म,
परेशानी नही उसमें हो रहा है जो,
क्योंकि होगा वही जो मंजुरे-खुदा होगा।
बस आनंद उठा उसका जो भी राहे-गुजर होगा।।

रब की कदर





     
सजदे रुठे हैं सारे,
माना गर्दिश में हैं सितारे,
ना थक, ना रुक
बस बढा दे तू कदम,
भुला दे हर गम,
ख्वाहिशों का जहाँ,
है माना लुटा हुआ,
फिर भी आएगा वो दिन,
जब मिलेगी तुझे मंजिल।
सबको सहने पङते हैं जख्म,
किसी को ज्यादा, किसी को कम,
ना दिखा खुद पर रहम,
वक्त लगाता आया है मरहम,
धूप से खिलती है छाया,
इसी से होने का वजूद पाया।
ये डोर कट जाएगी इक दिन,
हथेली के छाले मत गिन,
सुख-दुख है जीवन के रंग,
बिन एक के भी जहाँ बेरंग।
तो बढता जा, सँवरता जा,
विचारों को तराशता जा,
दुनिया होगी और भी बेहतर
यूँ बढेगी रब की कदर ।।

चाह जिंदगी की

ख्वाहिशों का जहाँ चाहिए तो
           कीमतें तो चुकानी ही होंगी,
खैरात तो सदा ही खुद्दारी का कत्ल करती आई हैं,
          चमत्कारों की उम्मीद पर मत जीना,
शिद्दत ही दरिया का रूख बदलती आई है।
          ये मुकाम लुट गया तो क्या हुआ,
जिंदगी ताउम्र मुकामों के जहाँ बसाती आई है,
           बह जाने दो दर्द की स्याह परत को अश्कों में,
क्योंकि धुली हुई नजरें ही नया साहिल दिखाती आई हैं।
            सबके सपनों को तोङा है तकदीर की बेवफाई ने,
फिर भी चाहतें ही लकीर का लिखा बदलती आई हैं,
             अफसोस ना कर दिल-ए-नादान,
एक तेरी ही गलियों में तबाही नहीं आई है।
              चैन तो कफन ही दिलाता है,
जिंदगी तो युँही बेचैनियों की तङप देती आई है,
              जी ले इसे जी भर कर ए दोस्त,
जैसा तूने चाहा जिंदगी तो वैसी ही नजर आई है।
              मुस्कुराहट होगी लबों पर, आँखों में होगी चमक,
जब अनथक कोशिशों में, संतुष्टी नजर आई है।।

नई परवाज

   बैठी थी दिल मसोसकर यूँही,
   तभी दूर पङी कलम मुस्कराई,
              और कुछ य़ूँ फरमाई-
    उठ बैठ अब किस फेर मे अटकी है,
        जमाना दौङ रहा, किस राह में तू भटकी है,
           जाग नींद से, देख सुनहरी भोर आई,
              चल ढूँढें उन उमंगो को, जो कहीं खो आई,
                  तसल्लियों में गुजर रहा, इक-इक दिन यूँही,
                     वक्त भाग रहा, जिंदगी खाक ना हो जाए कहीं,
    भला बैठी है क्यूँ दिल मसोसकर यूँही,
        उन धूँधले ख्वाबों की धूल चल अब उङाते हैं,
            सूने कदमों को ख्वाहिशों से धङधङाते हैं,
                आ आसमान की ऊँचाईयों को नापते हैं,
                   और दिल की नकारात्मक खाईयों को ढाँपते हैं,
                     जीवन गुजारा बहुत, अब जिंदादिली से जीते हैं,
                     तकदीर नहीं, तदबीर से अपनी कहानी लिखते हैं,
       तो चल आ करते हैं एक नया आगाज,
       गिरते- सँभलते भरते है एक नई परवाज।।

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