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आरती और दादी भाग 3- मुलाकात

             
  दो दिन बाद शीना अपनी दादी को लेकर आरती के घर आई। तीन गली के बाद अगली गली में मुड़ते ही, दो घर के बाद, तीसरे घर के सामने पहुँच कर, पीछे मुड़कर पूछने लगी-"दादी यही घर है ना... ?"
              अभी उसकी बात पूरी हुई भी नहीं थी कि उसी समय घर से बाहर भाग कर आती हुई आरती उससे टकरा गई, तो गुस्से से बोली-"देखकर नहीं चल सकती अं.......... !"                पर शीना की दादी को देखते ही अपनी ही बात बीच में ही काटते हुए और अपनी जीभ दांतों तले दबाकर बोली "राम-राम दादी। "
             जीभ निकालकर और आँखें टेढ़ी करके शीना को "ऐंं......" चिढाते हुए बाहर भाग गई। शीना की दादी हँस पड़ी।
            "कौन है आरती... ?? अरे बहन तू...! बड़ा इंतज़ार कराया तुमने तो....! पोती बताना भूल गई थी क्या...? नमस्ते शीना पोती  "-आरती की दादी ने शीना की दादी को चारपाई पर बैठाते हुए और शीना का अभिवादन स्वीकार करते हुए कहा।
           "शीना ने तो उसी दिन घर आते ही बता दिया था। क्या बताऊँ बहन बेटा और बहु तो सारा दिन खेत सँभालते हैं, तो घर पर भी तो कोई तो रहे। आज वो घर पर थे तो मैं आ गई। और बता कैसी है तू ..?"-शीना की दादी ने कहा।
           "मैं तो ठीक हूँ तू ये बता घर पर सब कैसे हैं? शीना पोती तू कैसी है? आरती से फिर झगड़ा तो नहीं हुआ ना तेरा..? हा... हा......!" -आरती की दादी ने हँसते हुए पूछा।
           " ..न... नही दादी। "-शीना ने झेंपते हुए जवाब दिया।  इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी वो।
           "ऊपरवाले की दया से सब ठीक हैं । अरे बहन बच्चे तो ऐसे ही रहते हैं, अभी लड़ेंगे और अगले ही पल फिर वैसे के वैसे।"-शीना की दादी ने हाथ और कंधा एक तरफ मटकाते हुए कहा।
          "बिल्कुल सही कहा बहन तुमने। बच्चे तो सिर्फ प्यार दिल से करते हैं, बाकी लड़ना-झगड़ना तो ऊपर-ऊपर से ही होता है। तभी तो सब द्वेष-भाव तुरंत ही हवा हो जाता है उनका ।......... पर हम बड़े द्वेष भाव दिल से करते हैं और प्यार ऊपर-ऊपर से तभी हमारा प्यार और भाई-चारा जरा सी खट-पट में तुरंत हवा हो जाता है। हमारी बुद्धि, समझ और शरीर तो समय के साथ बडे़ होते जाते हैं, पर हमारी औकात वैसे ही इतनी छोटी होती जाती है कि जरा सा किसी ने कुछ कहा नहीं कि हर बात हमारी औकात को लग जाती है और हम नाराज होकर बैठ जाते हैं।"-आरती की दादी ने जरा गंभीर होते हुए कहा।
              "अरी बहन औकात को छोडो़, आजकल के लोगों की अकड़ घरों की दीवारों से ज्यादा ऊँची हो गई है और खुद के सामने उनको कोई दिखाई ही नहीं देता।.......हमारा जमाना कुछ और था, लोगों का एक -दूसरे के बिना काम नहीं चलता था। इसलिए लोगों की कदर हुआ करती थी। ...... अब मशीनी दुनिया में एक-दूसरे का सहारा कम हो गया है और कदर भी।"-शीना की दादी ने भी उतनी ही गंभीरता से उत्तर दिया।
             शीना एक बार अपनी दादी को देखती तो एक बार आरती की दादी को, समझ तो उसको कुछ आ नहीं रहा था।  शब्दों को बोलते समय होंठों का आकार कैसा होता है, चेहरा कैसे हिलता है, आँखें कैसे छोटी-बडी़ होती हैं, हाथ कैसे हवा में हिलते हैं, ये सब देखने में वो एकदम तल्लीन हो गई थी।
            तभी अचानक आरती की दादी हँसते हुए बोली - "क्या देख रही हो शीना पोते...! दोनों दादियों के पोपले मुँह......!!"
            इस बात पर दोनों सहेलियाँ जोर-जोर से ठहाके लगाने लगी।
           "जी....?!!"शीना थोड़ी हड़बड़ा कर बोली।

            इतने में आरती की मम्मी चाय ले आई और शीना की दादी के पैर दबाते हुए बोली -"राम-राम चाची कैसी हो..? आज कैसे रस्ता भूल गई हमारी गली का। ये पोती है क्या आपकी..?....ले बेटा दूध पी ले। "दूध का गिलास शीना को देते हुए आरती की मम्मी बोली।
            "राम-राम बहू। हाँ ये मेरी लाडली पोती है। "-शीना की दादी ने चाय पीते हुए जवाब दिया।
             दूध पीकर शीना बोली -"आरती कहाँ गई चाची..? "
"अरे वो तो अपने ताऊजी के यहाँ आँगन में खेल रही होगी। इस पहर किसी में इतना दम नहीं के उसको घर पर रोक ले और खेलने से हटा सके। तुझे खेलने जाना है क्या उसके पास..? "- आरती की मम्मी ने पूछा।
             "हाँ चाची।"-शीना ने उत्तर दिया।
             "ठीक है तो ऐसा करना, यहाँ से गली में सीधे हाथ की तरफ जब तू जाएगी ना तो जो तीसरा घर है, उसके पीछे बहुत बड़ा मैदान है। वहाँ वो गली के बच्चों के साथ खेल रही होगी। वहाँ पहुँच कर तेरी ताईजी से पूछ लेना। ठीक है बेटा।"-आरती की मम्मी ने शीना को पुचकारते हुए बताया।
           "जा बेटा तू आरती के साथ खेल ले। मुझे तो अभी समय लगेगा।"-शीना की दादी ने कहा।
          "ठीक है दादी मैं खेलने जा रही हूँ।" -शीना ने घर से बाहर जाते हुए कहा।
         'आरती की दादी और मम्मी कितनी अच्छी है और आरती कितनी अकड़ू, नकचढी और लड़ाकू ह...!- पता नहीं वो मुझे खिलाएगी भी या नहीं।' शीना सोचते हुए गली से जा रही थी।


दादी और आरती- भाग-2- झगङा

       
   "दादी............दादी, कहाँ हो तुम ? मेरे साथ चल जल्दी स्कूल। जल्दी........... जल्दी। दादी...?  कहाँ हो....? माँ,  मेरी दादी कहाँ चली गई ?............ उनको स्कूल जाना था मेरे साथ, अभी इसी समय।"- आरती धड़धड़ाते हुए घर के अंदर आई और सवाल पर सवाल पूछती हुई दादी को ढूँढती हुई पूरे घर में भागती फिरने लगी।
      
 "स्कूल जाना था......?? पर क्यूँ....?? क्या हुआ...??"- माँ ने हैरान होते हुए पूछा।
                    
             "अरे माँ..! वो सब मैं घर लौटने के बाद बताऊँगी। अभी तो देर हो जाएगी। अब जल्दी से बताओ दादी कहाँ खो गयी हैं?"-आरती ने बेचैन और कुंठित होकर फिर से पूछा।
             "अच्छा ..! चल बाद में पूछ लूँगी। तेरी दादी तो तेरे ताऊ के घर गई है।"-माँ ने जवाब दिया।

             "भला ये भी कोई बात हुई..? मैं तो स्कूल से भागती हुई घर आई कि दादी को जल्दी से अपने साथ लेकर जाऊँगी, वो है कि ताऊजी के घर चली गई।............ अच्छा माँ मैं दादी को लेकर ताऊजी के घर से सीधे स्कूल चली जाऊँगी।" -आरती भागती हुई घर से निकलते वक्त जोर से बोलती हुई चली गई।
               "अरे...! पर बात तो बता..... ?"-माँ तो कहती रह गयी पर आरती वहाँ से भागती हुई चली भी गई।
             
"दादी..........!"-आरती दादी का हाथ पकड़कर खींचते हुए बोली - "जल्दी से मेरे साथ स्कूल चल।"
                "अरे...! क्या हुआ...? आज नहीं पोते, कल चल लूँगी। अभी देख मैं तेरे ताऊ जी से कुछ जरुरी बात कर रही हूँ।"-दादी ने जल्दी से जवाब दिया।
               "मेरे साथ चलकर भी तो तुमको बहुत जरुरी काम करना है। ताऊजी तो यही है......, फिर बात कर लेना। पर वो लङकी चली जाएगी अगर अभी तू मेरे साथ ना चली तो। दादी ... चल जल्दी। ताऊजी तुम दादी के घऱ आने के बाद बात कर लेना।"- आरती दादी को खींचकर ले जाते हुए कहने लगी।

5 मिनट बाद वो दोनों स्कूल पहुँच गई।
                "अब तो बता दे क्या जरूरी काम है...? तबसे तो यही कहे जा रही थी स्कूल जाकर बताऊँगी।"-दादी ने पूछा
             "अच्छा तो बताती हूँ ना। वो मेरे क्लास में एक लङकी है ना, क्या नाम है उसका... हाँ शीना।"-आरती ने बताना शुरु किया।
            "कौन शीना ...?"- दादी ने कुछ याद करते हुए पूछा।
           "अरे वही शीना, जिसके बारे में मैंने तुझे उस दिन बताया था,  वही जो सबसे लड़ती रहती है।" -आरती ने बताया।
          "मुझे तो याद नहीं तुमने कब बताया था किसी शीना के बारे में...! खैर जाने दे, और ये तो बता क्या हो गया उस शीना को?"-दादी ने पूछा।
           "ऊसको क्या होना था..! पता है दादी, आज जब मैं पानी पीने आई थी ना ... तो वो नल के पास खङी थी। ना पानी पी रही थी और ऊपर से बातें कर रही थी। तो मैंने ना उसके बाजू से आकर उससे पहले पानी पी लिया। तो पता है ना .... .... .... वो महारानी ना, मुझे मारने लगी..! तो मैने भी उसको मारा। फिर ना .. उसने मेरे बाल पकङकर खींच दिए तो मैने उसके बाल खींच दिए। फिर ना दादी पता है...... उसने एकदम से मुझको धक्का दे दिया। मैं बहुत जोर से गिरी, ये देख मेरी कोहनी पर चोट भी लगी है।"-आरती दादी को अपनी कोहनी दिखाने लगी।
           "अरे, मेरी मुम्मी को तो चोट लग गई....! बता कौन है वो शीना..? अभी उसकी खैर-खबर लेती हूँ।"-दादी ने नकली गुस्सेवाला चेहरा बनाकर बहलाते हुए कहा।
          "और पता है दादी, जब मैं नीचे गिर गई थी ना तो कहने लगी अबकी हाथ लगाया ना मुझको तो मेरे पापा को बुला लाऊँगी।....... तो मैंने कहा तेरे पापा क्या बङे डी.सी लगे हैं...? मैं अभी अपनी दादी को बुलाकर लाती हूँ, उनसे ना सब डरते हैं, मेरे पापा भी। फिर देखूँगी कैसे बोलेंगे तेरे पापा मेरी दादी के सामने....? तो फिर ना बङी सयानी बनके कहने लगी, जा बुला ला किसी को भी, मैं नहीं डरती किसी से भी। तो मैने कहा यही मिलना पानी के पास अभी बुलाकर लाती हूँ मेरी दादी को। ......... अब देखूँगी कहाँ छुपेगी तुमको देखकर....?"-आरती ने आँखें मचकाते हुए घमंड से कहा।
         "अच्छा ये कहा उसने। आई बङी....! मैं भी तो देखूँ कौन है वो किसी से ना डरने वाली...?"- दादी ने अपनी हँसी छिपाते हुए कहा।

         आरती स्कूल के बीच खङी होकर ईधर-उधर शीना तो ढूँढने लगी। तभी शीना उसको पानी के पास किसी से बातें करती हुई दिख गई, तो वो दादी का हाथ पकङकर उस ओर खिंचती हुई जोर से बोली-"दादी देखो वो रही वो नकचढी...! बङबोली....!पागल कहीं की...!"
           "कहाँ.. ? किधर...? मुझे तो नही दिख रही..!"-दादी ने ईधर-उधर देखते हुए पूछा।
            "अरे दादी ये रही...!    देख ये है मेरी दादी ......। अब बोल क्या बोल रही थी तू....? बोल ना..!    ...........कुछ बोलती क्यूँ नहीं अब...?"-रौब झाड़ते हुए बोली आरती।
           "तो तू है शीना..! तुमने मारा कैसे मेरी पोती को...? आगे से ऐसा कुछ किया ना तो तेरी खैर नही। समझी..!"-दादी ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा।
            शीना अचानक झेंप गई और ऊपर से आरती दादी के पीछे खड़े होकर टेढे-मेढे मुँह बनाकर शीना को चिढाने लगी।
           "अच्छा पोते...! तेरी स्कूल की छुट्टी हो रखी है तो तू अपना थैला ले गयी थी क्या घर..?"- दादी ने पूछा।
            "नहीं दादी, थैले के चक्कर में पड़ती तो तुझे बुला कर लाने में देर ना हो जाती।"-आरती ने समझाया।
             "तो ठीक है, जल्दी से अपना थैला उठा ले आ। मैं तब तक इसकी अच्छे से खबर लेती हूँ।"- दादी ने कहा।
            "ठीक है दादी अभी लाई।"- आरती ने शीना को चिढाते हुए कहा और अपना थैला लेने क्लास की तरफ भागी।
            "अरे पोते डर मत, असली में थोङी ना डाँट रही थी। अच्छा तेरे पापा का क्या नाम है पोते...?" -दादी ने प्यार से पुचकारते हुए पूछा।
            "मेरे पापा का नाम दलबीर फौजी है।"- शीना ने धीरे से बताया।
             "अच्छा तेरे दादा का नाम केहर सिंह है क्या....?"- दादी की आँखों में चमक थी पूछते समय।
            "हाँ..." - शीना ने छोटा सा जवाब दिया।
            "तो तेरी दादी को आज घर जाकर कहना......, मेरी दादी मास्टर की माँ बुला रही थी और तू भी उसके साथ आना........।    ठीक है बेटा याद रखेगी ना......!  क्या कहेगी जाकर....?" -दादी ने दुलारते हुए पूछा।
            "यही की दादी मास्टर की माँ मिलने के लिए बुला रही है।"- शीना ने थोङा सहज होकर जवाब दिया।
            " शाबाश, तू तो बड़ी सयानी है रे...!"-दादी ने कहा कि तभी आरती थैला ले कर वापस आ गई थी।
             "अच्छा अब जो भी कहा है, भूलना मत...! समझी....! जाकर अपनी दादी को बता देना कि मैंने बुलाया है।... याद रखना।... ठीक है...!" -दादी ने समझाते हुए कहा और आरती से बोली -"चल बेटा घर चलते हैं।"
             थोड़ी सी आगे जाने के बाद दादी फिर से बोली -"बहुत डाँटा मैंने उसको। देखना आगे से ऐसा कुछ वो कभी भूल कर भी नहीं करेगी।"- दादी ने तसल्ली दी।
             "वो तो ठीक है दादी लेकिन उसकी दादी को क्यूँ बुलाया तुमने घर..?" -आरती ने असमंजस में पूछा।
             "अरे..! उसकी दादी के सामने भी तो डाँटूगी ना,इसलिए बुलाया है..!" -दादी ने बात टालते हुए कहा।
              "अच्छा...! तू तो फिर उसकी दादी से भी नहीं डरती ना दादी....! तू तो बड़ी मस्त है दादी..! मैं भी तेरी तरह बनूँगी...!"-आरती चहकते हुए बोली।
               "हा....  हा.... अच्छा...!" -दादी हँसने लगी।

आरती दादी की उँगली पकड़कर उछलते -कूदते घर आ रही थी। दादी पर बड़ा गर्व हो रहा था उसको।






दादी और आरती- भाग 1- स्कूल का पहला दिन

"दादी, मुझे स्कूल जाना है, मेरा ना बहुत मन कर रहा है। चलो ना दादी। दादी, तुम कुछ बोलती क्यूँ नही? दादी ..... ! दादी .....! सुनो ना, चलो ना ।"- एक छोटे से गाँव की पाँच साल की आरती ने जिद करते हुए कहा।
                बात 1995 की है, बस एक ही सरकारी स्कूल था उस गाँव में और वो भी सिर्फ आठवीं तक का।
                 "सुन तो रही हूँ ना पोते, मेरा मुम्मी...! स्कूल जाना है...? पर अब तो दस से भी ज्यादा समय हो गया है। कल पक्का चल लेंगे, आज तो बहुत देर हो गई है।"- 80 साला दादी ने कहा, जो 60 की लगती थी शरीर से भी और फुर्ती से भी।
                  "नहीं..नहीं..नहीं..,"- पैर पटकते हुए आऱती ने कहा.. "मुझे तो आज ही जाना है और अभी जाना है। मैं कुछ नहीं जानती, अभी चलो ना दादी। "-आरती दादी को हाथ से पकङकर खींचते हुए कहती है।
                 "अच्छा ठीक है बाबा चलती हूँ, जुत्ती तो पहनने  दे एक बार। अरे मेरी जुत्तियाँ कहाँ चली गई भई...?"- दादी ने हैरान होकर पूछा।
                "अभी लाई दादी, मैंने ही उठाकर अंदर रख दी थी तुमको चिढाने के लिए।"- आरती दौड़कर अंदर जाते हुए बोली।

               "मुझे चिढाने के लिए..?? क्या मतलब..??"-दादी ने और भी हैरानी से पूछा।
               "कुछ नहीं दादी, तुम बस चलो ना जल्दी, पहले ही देर हो चुकी है और देर मत करवाओ।"-आरती ने जुत्तियाँ रखकर रौब छाड़ते हुए कहा।
               "अच्छा..! चल मेरी माँ..! मैं देर करवा रही हूँ..!!"- दादी ने हँसते हुए कहा। "अरे देर तो पहले ही हो चुकी है। तभी तो कह रही हूँ कल चलते हैं।"
                "हूं...हूं... दादी...!!"-आरती ठुनकने लगी, एक कंधे को गर्दन से सटाकर, रुठकर एक कोने में जाकर बैठ गई। होंठो को लटकाकर, तिरछी नजरों से दादी को देखने लगी।
               आरती के रूठने के इस अंदाज पर दादी की हँसी छूट गई।अपने हाथ से अपनी हँसी छुपाती हुई कहने लगी- "ओ...हो.. मेरा चाँद तो रूठ गया, मेरा मुम्मा। चल तो चलते हैं ना।"- दादी ने आरती को गले लगाते हुए कहा।
               कुछ देर बाद आरती दादी की ऊँगली पकङकर उछलती-कुदती हुई स्कूल जा रही थी।
                     थोङी देर बाद आरती दादी की ठीक वैसे ही ऊँगली पकङकर उछलती-कुदती हुई वापिस आ रही थी।
            ऱास्ते में उसकी माँ और परिवार की कुछ दूसरी औरतें कुँए से पानी लाने के लिए जाते हुए मिली।

               "कहाँ से आ रही है सवारी..??"-माँ ने पूछा।

             "माँ हम स्कुल गए थे।"-आरती ने बताया।
       "आज...? पर आज तो इतवार है। पता नहीं था क्या..? हमसे पूछ लेते हम ही बता देते।"- माँ ने हैरानी से पूछा।
            "मुझे तो याद ही नहीं था। पूछने का मौका कहाँ दिया इसने। तुम लोग तो खेत में गए थे, इसने जिद कर दी स्कूल जाने की। जा पोते.., तू जाकर खेल ले, वो देख तेरी सारी सहेलियाँ वहाँ खेल रहीं हैं।-दादी ने आरती से कहा।
            "हाँ दादी वो सब खेल रही हैं, मैं भी जाती हूँ खेलने। माँ मैं खेलने जा रही हूँ।"- आरती भागते -भागते बताकर चली गई।
            "..हा..हा "-दादी ने हँसते हुए बताना शुरु किया- "जब चपड़ासी ने बताया कि आज तो इतवार है और आज तो छुट्टी है, तो ये रोने लगी और कहती- .....दादी..! ये क्या बात हुई..?आज ही तो मैं स्कूल आई थी और आज ही इतवार बना दिया,... फिर किसी दिन बना लेना ना इतवार।..! आज तो मैं जाऊँगी स्कूल के अंदर। मुझे नहीं पता,.... मुझे तो अभी जाना है अंदर।  फिर चपड़ासी ने कहा आज तो कोई भी नहीं आया है, कल से आ जाना। आज तो मास्टर जी भी नहीं आए तो तुझे पढाएगा कौन? ...तो कहने लगी... तो क्या हुआ बुला लो मास्टर जी को और कह दो कि इतवार किसी और दिन बना लेना। फिर मैंने समझाया कि मास्टर जी तो दूसरे गाँव में रहते हैं, वहां से उनको कौन बुलाकर लाएगा। ऐ बेटा...! अब जिस दिन मेरी पोती आए ना, उस दिन आगे से इतवार मत बनाना। नहीं तो मुझसे बुरा कोई भी नहीं होगा, समझे..! इस बात पर श्यामू चपड़ासी बोला ठीक है दादी आगे से जिस दिन आरती आएगी उस दिन इतवार नही बनाएँगे और हँसने लगा। तब कहीं जाकर वापस आने को तैयार हुई है ये। "
            इस बात पर सब जोर से हँसे और फिर अपने-अपने काम पर चल दिए।

खुला दरवाजा





बहुत शोकाकुल माहौल था घर का..! बुढ़े माँ-बाप अपने जवान बेटे और बहु की लाश के पास बैठे बिलख रहे थे। वो तो अपना  सब कुछ ही हार चले थे । दुख इतना बड़ा था कि कोई सुरते-हाल ही नजर नहीं आ रहा था, जिंदा रहने का..!
               दुख में कोई अगर-मगर नहीं होता, पर बुढ़े माँ-बाप के दिल से एक आह बार-बार निकल रही थी -काश हमारा बेटा ऐसा ना करता..!!  मरना ही था तो खुद को ही मार लेता, बहु और मिनी के साथ तो ऐसा ना करता या हम दोनों को भी इन सबके साथ ही मार देता। हम दोनों अब जिंदा रहकर भला करेंगे भी क्या..?? हाय.! ये क्या हो गया ..??  हमसे ऐसा क्या पाप हो गया था जो मौत से भी बदतर सजा मिली..?? भगवान ने हमारे साथ ऐसा क्यूँ किया..??
               चार दिन हो आए थे इस बात को पर मिनी को अब तक होश नहीं आया था। लोग शोक मनाने घऱ आने लगे थे, पर दादा-दादी तो दिन-रात अपनी मिनी के पास अस्पताल में ही रहते थे। डॅाक्टर ने कहा है उसकी हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है और अभी कुछ कहा नहीं जा सकता।
              दस दिन बाद आखिरकार मिनी को अस्पताल से छुट्टी मिल ही गई।
              अब दादा-दादी घऱ पर थे अपनी मिनी के साथ। शोक मनाने वाले अब उनके घऱ आने की खबर सुनकर फिर से आने लगे थे।
             सब लोग उन बुढे माँ-बाप को सांत्वना देते, हिम्मत रखने की सलाह देते और अफसोस जताते और कहते-
            "बहुत बुरा हुआ जी..! भगवान ऐसा किसी दुश्मन के साथ भी ना करे..! इकलौता बेटा था, सब बातों की मौज थी। ईश्वर जाने क्या मन में आई, पूरे परिवार को ही खत्म कर डाला..!  होनी को कौन टाल सकता है भला..!  वो तो शुक्र है ऊपरवाले का, पोती की जान तो बच गई। पर ये दुख भी कुछ कम नही है, पोती की जगह अगर पोता होता तो कुछ सालों की दिक्कत होती बस फिर उसके जवान होने पर फिर से रौनकें लग जाती घऱ में। पोती तो लङकी है, पराया धन है, कल को अपने घर चली जाएगी। पोता होता तो बुढापे का सहारा बनता, वंश आगे बढाता। पर क्या किया जा सकता है..? भगवान की मर्जी के आगे कहाँ  किसी की चलती है, जैसे वो रखना चाहे वैसे ही रहना पङता है। अब जो हो गया उसको तो बदला नही जा सकता, सब्र करो समय सब ठीक कर देगा।"

                   इन सबके बीच एक व्यक्ति था जो शांति से सबकुछ सुन रहा था, बुढे माँ-बाप के पास आया और कहने लगा- "जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ। जिस दुख से आप गुजर रहें हैं, मैं वो समझ सकता हूँ, क्योंकि मैं भी एक पिता हूँ। बेशक बहुत बुरा वक्त है ये आपकी जिंदगी का, शायद अब तक का सबसे बुरा। पर एक बात तो आप भी जानते हैं, वक्त की तो फितरत ही होती है गुजरने की, सो ये बुरा वक्त भी गुजर जाएगा।"
                  एक गहरी सांस लेकर कहा- "समय सबसे बङा मरहम है, हर जख्म भर देता है। मैं जानता हूँ इन सब बातों से आपका दुख ना कम होगा और ना बँटेगा, पर हम जैसे इंसान सिवाय चंद शब्दों के कहने के और कर भी क्या सकते हैं। पर एक बात कहना चाहता हूँ, जानता हूँ ये वक्त मुनासिब नहीं है ऐसी बातें करने का। पर फिर भी जरुरी है।"
                 बुढे और दुखी पिता के हाथ पर हाथ रखते हुए उस व्यक्ति ने कहा- "आपके बेटे और बहु को वापिस नहीं लाया जा सकता, पर अभी भी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। उनका तो जीवन का सफर इतना ही लिखा था, पर कम से कम इस बात से दुखी मत रहना की मिनी पोती है।................. बेटियाँ हर फर्ज बखुबी निभाती हैं, ..बेटों की ही तरह,..बशर्ते उन्हें निभाने दिया जाए। हमने बेटी,..बहन,.. पत्नी ..और माँ के दायरे के नाम पर इतनी बंदिशों का जाल बुन दिया है उनके चारों तरफ कि एक दिन उस जाल से उलझते-उलझते उसी जाल में उनका दम घुट जाता है। हम हमेशा उन्हे उन जिम्मेदारियों को निभाने के नाकाबिल मानते हैं, जो उन्हे कभी निभाने ही नहीं देते।"
                 एक लंबी सांस लेते हुए कहना जारी रखा- "जहाँ तक वंश आगे चलाने की बात है, कुदरत ने तो आदमी और औरत दोनों की सहभागीता निर्धारित की हुई है। पर अगर नाम किसी एक का ही चलता है, ये नियम तो हमारा ही बनाया हुआ है ना। सदियों से चलती इस मान्यता ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि अब यही वास्तविकता बन गई है..! पर सच क्या है उसकी वास्तविकता हम कभी समझना ही नही चाहते।"

                 बुढे पिता के हाथों को अपने हाथ में लेकर बहुत ही सहज शब्दों में कहा- "जानता हूँ ये मौका नही है  ऐसी बातों का, पर ऐसे समय पर ही तो हम इंसान जिंदगी को सच में समझने औऱ उसे जानने की कोशिश करते हैं।..... उम्मीद करता हूँ बुरी तो नही लगी होंगी मेरी बातें..!! ईश्वर आपको इस सदमें से उबरने की हिम्मत दें..! अपना और मिनी बिटिया का ख्याल रखना आप दोनों। अच्छा ! अब ईजाजत दीजिए।"
                "कौन था ये आदमी..?  कैसी अजीब बातें कर रहा था..?  ना वक्त देखा, ना मौका और लगे भाषण देने। अरे कम से कम ये तो देख लेता किनसे बात कर रहा है..! इनका यहाँ पूरा परिवार उजङ गया और उनको बेटियों का बखान सूझ रहा है। बताओ तो था कौन ये आदमी..??"- एक रिश्तेदार ने शिकायती लहजे में पूछा।
                "ये हमारे पङोसी हैं मामीजी, बस दो घर छोङकर घर है इनका। अब तो वैसे बाहर रहते हैं, आते रहते हैं गाँव में ।.... जब भी आते हैं मिलकर जरुर जाते हैं। बहुत ही भले आदमी हैं।..... तीन बेटियाँ हैं इनकी। तीनों ही बङे ओहदों पर नौकरी करती हैं। और दामाद तो सुनने में आया है, बेटों से भी बढकर सेवा करते हैं इनकी। जो भी कहा है इन्होने, इनके जीवन पर नजर डाली जाए तो सही ही लगता है।"- बुढे माँ-बाप की बङी बेटी ने बताया।
                "वो सब तो ठीक है, पर ये समय तो ठीक नही है ना इन सब बातों के लिए।"- मामीजी ने इस बार जरा नरम लहजे में कहा।
                     इसी बीच बुढे माँ-बाप एक-दूसरे की तरफ देखकर, एक-दूसरे के दिल की आवाज का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं कि क्या भगवान ने सच में सौ दरवाजे तो बंद कर दिए, पर एक दरवाजा खोल भी दिया है।






चांटा

"सुन, कहाँ जा रही है? ?"
"अरे मम्मी !..बस वो गली के मोड़ तक ही जा रही हूँ। मेरा पेपर है ना परसों, तो मुझे कुछ जरुरी नोट्स चाहिए है। मेरी वो सहेली है ना सिम्मी, वो अभी अपनी ट्युशन क्लास से घर जाते हुए मुझे अपने नोट्स देने के लिए उस मोड़ तक आ रही है। आपको तो पता है ना मेरा गणित कितना कमजोर है। मेरी तैयारी में मदद हो जाएगी। नहीं तो बहुत गंदे नंबर आएँगे मेरे।"- अपनी मम्मी के कंधो पर हाथ रखते हुए संध्या ने कहा।
"क्यूँ ..?? उसे पढाई नहीं करनी क्या..? जो वो अपने नोट्स तुझे देने आ रही है।"-मम्मी ने पूछा।
"अरे मम्मी, उसने वो नोट्स अच्छे से दोहरा लिए तभी बड़ी मुश्किल से देने को तैयार हुई है। अब मैं जाऊँ??..नहीं तो वो चली जाएगी। बड़ी मुश्किल से मनाया है यहाँ तक आने के लिए।"-संध्या ने पूछा।
"ठीक है पर अकेले नहीं जाएगी तू। अपने भाई को बोल तेरे साथ चलने को।"-मम्मी ने हुक्म दिया।
"मम्मी..!!! ये क्या बात हुई भला...??? आपको पता तो है ना भाई का, वो कहाँ घर में रहते हैं। पता नहीं कहाँ निकल गए थे घर आते ही। अरे मम्मी जाने दो ना, यही तक तो जाना है, वो मेरा इंतजार कर रही होगी, ज्यादा देर नहीं रुकेगी। प्लीज मम्मी।"-संध्या ने जिद करते हुए कहा।
"ठीक है तो मैं चलती हूँ तेरी साथ।"-मम्मी नेअपना दुपट्टा ठीक करते हुए कहा।
"ठीक है  मम्मी तो फिर जल्दी चलो।"- संध्या ने चहकते हुए कहा।

नोट्स लेने के बाद घर में घुसते ही संध्या ने अपनी मम्मी से पूछा- "मम्मी मुझे एक बात समझ नहीं आती भाई सारा दिन घर से बाहर रहते हैं। बिना बताए कहीं भी जाते हैं। आप उनको तो कभी कुछ नहीं कहती। मैं नीचे गली तक भी जाऊँ तो कभी अकेले नहीं जाने देती। ऊपर से दस सवाल पूछती हो। ऐसा क्यों ..???"
"देख बेटा तू लड़की है और जमाना बहुत बुरा है। तुम्हारे साथ कुछ गलत हो गया तो?  हम क्या करेंगे फिर..?? कौन तुझसे शादी करेगा..??  घर की इज्ज़त उछलेगी सो अलग। और बात सिर्फ जमाने की नहीं है, भले घर की लड़कियाँ ऐसे मटरगश्ती करती नहीं घूमती। भाई तो लड़का है। यही तो उम्र है मौज-मस्ती की। फिर तो जीवन के इतने छमेले हैं,उसको कहाँ वक्त मिलेगा मौज-मस्ती का।"- मम्मी ने समझाते हुए कहा।
 "तो क्या लड़कियों को सिर्फ शादी के लिए जन्म दिया जाता है..?? हमारी उम्र कब होती है मौज-मस्ती की और भले घर के लड़के आवारागर्दी करते फिरते रहे तो घर की इज्ज़त नहीं उछलती क्या मम्मी..??"- संध्या ने तपाक से नए सवाल दाग दिए।
"बड़ी ज़बान चलने लगी है तेरी तो। अब मेरी ये बात कान खोलकर सुन जब एक लड़की अपने बाप के घर पर बाप-भाई की मर्जी से चले और पति के घर में पति की मर्जी से रहे तो सारी उम्र मौज में रहती है। ये जो अपने माँ-बाप और पति की  शिकायतें करती हैं ना, वो ज्यादातर उनकी मर्जी से नहीं चलती इसलिए सारी दिक्कतें होती हैं। तुझे भी ये सब सीखना है इसलिए बता रही हूँ। क्योंकि शरीफ़ और सुशील लड़कियों की यही निशानी होती है। समझी।"- मम्मी ने इस बार थोङा और सख्ती से समझाते हुए कहा।
"और शरीफ़ और सुशील लड़कों की क्या निशानी होती है मम्मी..?? लड़कियाँ दूसरों की मर्जी से ही जीने के लिए पैदा होती हैं क्या..?? क्या कभी अपनी मर्जी से नहीं जी सकती ..??"- संध्या सवाल पर सवाल करते हुए बोली।
"अरे..! कितने सवाल पूछेगी तू..?? अगर तू इन सबको खुश रखेगी तो ये सब भी तो तेरी खुशी का ख्याल रखेंगे।"-मम्मी ने इस बार थोङा शांति से समझाते हुए कहा।
"तो इसका मतलब लड़कियां तो सिर्फ दूसरों का हुक्म बजाने के लिए जन्म लेती हैं। पर स्कूल में तो सिखाया जाता है कि मैं पढकर कुछ भी कर सकती हूँ ,तो क्या मैं अपनी मर्जी से नहीं जी सकती..?? और आप लड़कों के बारे में कुछ क्यूँ नहीं कह रहीं..?? मैंने कितनी बार आपको बताया है भैया की हरकतों के बारे में । मेरी सब  सहेलियाँ उनकी शिकायत करती हैं कि वो आते-जाते उनको छेड़ते हैं। पर आपने आज तक भी उनको कुछ नहीं कहा। कभी उनपर भी जरा रोक-टोक लगा दिया करो। मेरी बड़ी बेइज्जती करवा रखी है उन्होने पूरे स्कूल में।"-संध्या ने रोष दर्शाते हुए कहा।
"बस बहुत हुआ अब और फालतू बकवास नहीं। दुनिया में हमेशा से ऐसा ही होता आया है और ऐसा ही होगा। तू कोई अल्बेली नहीं है, जो तेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। मुझे नहीं कहना तेरे भाई को कुछ। अभी बच्चा है, जब बड़ा होगा अपने आप सब समझ जाएगा। तू मुझे मत सीखा,  तू कल की लड़की मुझे बताएगी क्या सही है और क्या गलत। तुझसे ज्यादा दुनिया देखी है मैने।....और अब तुझे पेपर की तैयारी नहीं करनी क्या..?  जा पढ ले जाकर। एक बात और कान खोलकर सुन ले, आगे से ये सब बकवास बोलना तो दूर, सोचना भी मत। समझी..! लङकियों को ऐसे ही जीना होता है। अब अगर मार ना खानी हो तो जाकर चुपचाप पढाई कर ले।"- मम्मी ने संध्या को चांटा दिखाते हुए कहा।
थोड़ी देर बाद-
 संध्या के पापा चिल्लाते हुए घर के अंदर आए - "सीमा कहाँ हो तुम। जल्दी यहाँ आओ। सीमा...??..... सीमा..?? सुनती हो कि नहीं..?? कब से चिल्ला रहा हूँ..!"
"क्या हुआ..?? आ रही हूँ। क्या बात है..?? सब ठीक तो है ना..??"- संध्या की मम्मी ने घबराते हुए पूछा।
"सब ठीक ही तो नहीं है। रोहन को पुलिस पकड़कर ले गयी है। तुम्हारे भाई को फोन करो जल्दी से कोई जुगाड़ लगाये और जल्द से जल्द उसे छुड़ाए।"- संध्या के पापा ने हाँफते हुए कहा।
"हे भगवान..! पर क्यूँ..??  मेरे बच्चे ने किसी का क्या बिगाड़ा है..???"- मम्मी ने रोते हुए पूछा।
"वो सब बाद में बताऊँगा, पहले तू अपने भाई को फोन तो लगा।"
"ठीक है, अभी लगाती हूँ।"

"मम्मी बड़ी तेज भूख लगी है, खाने को है क्या कुछ? ? और पापा क्या कह रहे थे। वो मैं कम्प्यूटर पर हैडफोन लगाकर काम कर रही थी, तो सुनाई नही दिया क्या कह रहे थे वो।................. मम्मी....! क्या हुआ...?? आप ठीक तो हो ना? ?"- संध्या ने अपनी मम्मी को रोते हुए देखकर पूछा।
"वो तेरे भाई को पुलिस पकड़कर ले गयी।"-मम्मी ने रोते हुए बताया।
"क्या?? पर क्यूँ??"- अचानक संध्या के मुँह से निकला।
"अरे किसी करमजली ने पुलिस में शिकायत कर दी छेड़छाड़ की। उसे और उसके दोस्तों को पुलिस उठा कर ले गयी।....... कीड़े पड़े उस करमजली को..!! तेरे पापा बता रहे थे पुलिस ने बहुत मार लगाई मेरे लाल को। हाय..! ... हाथ नही काँपे उनके मेरे मासूम से लाल को मारते समय। ..जरा सी भी दया नहीं आई उनको..?? और ये  लड़कियाँ..! कोई शर्म लिहाज तो है नहीं इनको, खुद तो नंगा-नाच करती फिरती है, कोई कुछ कहदे इनकी बेशरमी देखकर तो पुलिस बुला लेती हैं।... पता नहीं कोई इनको कुछ क्यूँ नहीं कहता और पुलिस इनको क्यूँ नहीं पकड़ती..?? कितना गंद फैला रखा है हर जगह इन्होने।"- मम्मी गुस्से में बङबङाने लगी।
"गंद इन्होने नहीं आपके बेटे ने फैला रखा है।"-संध्या गुस्से से तमतमाती हुई बोली-" कितनी बार मैंने आपको बताया था भाई की हरकतों के बारे में। पर आप हमेशा मुझे ही चुप कर देती। आज ही तो बताया था मैंने, आप तो मारने तक चली थी मुझे।........ पर नहीं सारी बंदिशें तो लङकियों के लिए होती है ना, भगवान ने तो सिर्फ लङकों को ही बनाया है ना, हमको नहीं। इसलिए उनको गलत करने का लाईसेंस भी मिल गया ना..! है ना मम्मी..!! और कैसी बेशरमी मम्मी..?? स्कुल की वर्दी और आप जो पहनते हो वो भी बेशरमी में आता है क्या। क्योंकि वो स्कूल की लङकियों को तो छोङो आप की उम्र की औरतों को भी नही बख्शते। ये सब नंगा-नाच और बेशरमी में नहीं आता है क्या.. ?? वैसे भी गंद कपङों में नही भाई जैसे लोगों की सोच में होता है।"
 एक गहरी और लंबी सांस लेकर संध्या फिर से कहना शुरू करती है- "काश उनको भी रोका-टोका होता तो आज ये दिन ना देखना पङता। काश के कभी आप लोग ये समझे कि लङकों को समझाना भी आप लोगों की ही जिम्मेदारी होती है और उनको भी रोकना-टोकना होता है, क्योंकि माहौल सिर्फ लङकियाँ खराब नहीं करती। लङके भी जिम्मेदार होते हैं उस माहौल को खराब करने में। ये सरासर आप लोगों की गलती है, अगर आप दोनों ने उसको समझाया होता कि ये सब गलत है तो शायद वो ऐसा कभी नहीं करते।"

अचानक से एक जोरदार चांटा उसके मुँह पर पङता है।
"....चुपचाप चली जा यहाँ से, वरना अब तेरे साथ जो सलुक होगा उसकी जिम्मेदार तू होगी।..... बङी आई हमको गलत कहने वाली। कहीं गुस्से में मैं हद से बढ जाऊँ तू चुपचाप चली जा यहाँ से।"-गुस्से में लाल-पीली होते हुए मम्मी ने कहा।

 संध्या पैर पटकते हुए अपने कमरे में गई और धङाम से बैड पर गिरकर रोने लगी। रोते-रोते उसके दिमाग में एक सवाल कौंधा- ये चांटा उसके मुँह पर था या समाज के।।।।




जिंदगी और जीवन

उस खूबसूरत सुबह के बाद आई उस रात ने मेरे होशो-हवास गुम कर दिए। मैं खाली आँखों से आसमान के उस चांद को बेसुध होकर देखते हुए चलती जा रही थी। ना कोई अहसास था, ना कोई सपना था।
ना  ही कोई डर था, ना डर के लिए कुछ बचा ही था। आँखों मे आँसु ना थे और ना नजरों में अहसास था। उस काली अंधेरी रात मे ना दिशा थी, ना राहें  और ना मंजिलें थी। अचानक ठंडी हवाओं का सा अहसास हुआ। कदम उसी दिशा में चल पङे जहाँ से हवाओं में ठंडक आ रही थी।
कदम बढते गए, ठंडक बढती गई। ना कोई ठोकर लगी ना ही किसी ने आवाज दी। हो सकता है ठोकर लगी हो, मैं गिरी भी होंगी, पर खुद की चीत्कारों से शायद कान बहरे हो चुके थे मेरे, इसीलिए कुछ सुना ही नही और अहसास तो बचा ही नही था।

रात का अंधेरा घटने लगा, मेरे कदम बढने लगे पर ठंडक का अहसास कम होता जा रहा था।
मैं और भी तेज चलने लगी । शायद ये सोचा होगा मैंने, भागकर उस ठंडक को पकङ लूँगी और उसी के साथ ये बाकी का सफर तय करूँगी।
सूरज की रोशनी फैलने लगी, सुनहरा सवेरा मेरी आँखों की रोशनी भी लाता सा नजर आया। खूबसूरत लगा वो सुनहरा सवेरा

वो लाल-लाल सूरज! वो सुनहरी सोने सी चमकती धरती! सुबह के उस सौंदर्य ने मेरी नजरों को जिंदा कर दिया। मेरे होंठो पर जानी-पहचानी सी मुस्कान आ गई। मुझे लगा मैं स्वर्ग में हूँ। एक नई फुर्ती मेरे अंदर समा गई जैसे और मेरे कदम सूरज की तरफ बढने लगे। मैं खुश थी कि मुझे मेरा रास्ता मिल गया, तो अब मंजिल भी मिल ही जाएगी। मैं भागती हुई सी चलने लगी।
पर कुछ था जो बिछुङ रहा था, मैंने खुद से पूछा -क्या बिछुङ रहा था..?? मेरे साथ था ही क्या जो बिछङेगा, मेरे पास खोने को कुछ बचा ही नही था ................ तो............. मतलब  अब तो सिर्फ पाने को ही बचा है। हाँ मेरे पास खोने को कुछ नही है, मुझे तो अब बस पाना ही है, बहुत कुछ पाना है! जो पाना चाहती हूँ, वो सब पाना है! इस सोच ने मुझे एक नई खुशी दी, शांति दी और दिया आगे बढने का एक नया जज्बा! मैं चले जा रही थी, मुस्करा रही थी औऱ गुनगुना रही थी! सब कुछ पाने जो चली थी!

क्या हुआ जो वो खूबसूरत सुबह चली गई, ये सुबह भी तो खूबसूरत है। इस सुबह तो मैं सब-कुछ पाने निकली हूँ। इस बात ने तसल्ली दी मुझे। इस बीच कितने काँटे चुभे, कितनी झाङियों ने रास्ते रोके, कितने ही पंछियों की आवाजों ने मेरा ध्यान भटकाना चाहा।
 पर कुछ पाने की ललक ने मुझे हिम्मत ना हारने दी, दर्द ना होने दिया और ना ही मेरा ध्यान भटकने दिया। मैं बढती चली गई और अब हवाओं की ठंडक की तरफ ध्यान नही रहा था मेरा।
            हे भगवान! इस बार अपनी बेटी की चाहतों पर किसी की नजर ना लगने देना, मेरे सर पर अपना साया बनाए रखना!- मैंने भगवान से प्रार्थना करते हुए मन ही मन बुदबुदाया। उसी वक्त, एक तेज ठंडी हवा का झोंका आया, जिससे ऐसा लगा जैेसे भगवान मेरे पास ही है और उन्होने मेरी दुआ कबुल कर ली हो।
            इस ख्याल से ही मैं सावन की फुहार के बाद खिले और साफ-सुथरे बाग की तरह खिल गई। इतनी शांति मिली दिल को कि इसके आगे मुझे हवाओं के मिजाज का अहसास ही नही हुआ। आँखों मे बसे सपने मुझे चलाते गए और मैं चलती गई।
पर अचानक ये आँखों मे जलन सी क्यूँ हो रही है?? हवाएँ गर्म क्यूँ हो रही हैं??  मेरा दिल घबरा सा क्यूँ रहा है??  ये बेचैनी सी क्यूँ हो रही है??
         कुछ नही है पागल! अभी-अभी इतना बङा जख्म जो खाया है, तो बस डर सा लग रहा है। अभी दिल थोङा बीमार है ना; तो अभी उसको थोङे आराम की जरुरत है और बीमार जल्दी घबरा जाता है ना; तो ये भी घबरा रहा है। मैनें अपने आप को समझाया, तसल्ली दी, एक लंबी और गहरी सांस ली।
       मैने खुद को डाँटा-पागल। अब क्यूँ घबरा रही है?? अब तो सब ठीक होने वाला है ना...!? ऐसा कहकर खुद को तसल्ली दी थी या सवाल पूछा था, मैं खुद भी जान नही पाई थी पर अब मैं अच्छा महसूस कर रही थी। मेरे दिल को चैन आ गया था।
                    फिर सन्न से हवाएँ आई औऱ मेरे कानों में सनसनाहट फैला गई। मेरा दिल धक् से रह गया। उन हवाओं के थपेङों में उङती बालु मेरी आँखों में घुस गई। मेरी आँखें बंद हो गई। मैंने अपनी आँखें मसली और धीरे-धीरे खोली, पर वो जरा सी खुली और फिर बंद हो गई।
              धीरे-धीरे आँखें खोली तो लगा जैसे सच में इस बार आँखें खुल गई थी। मैंने चारों और नजरें घुमाई; ये मैं कहाँ आ गई? मैं कहाँ जा रही थी? मैं किसलिए आई यहाँ ? मेरा दिल जोर-जोर से धङकने लगा।
            फिर दिल ने ही जवाब दिया- अरे मैं तो सब कुछ पाने के लिए आई हूँ यहाँ। इसी चाहत ने मुझे ये रास्ता दिखाया है और रास्ते पर चलकर ही तो मंजिल मिलेगी। तभी तो मुझे सब-कुछ मिलेगा। अरे भगवान ने भी अब तक कोई काँटा नहीं चुभने दिया मुझे, कोई झाङी भी नही आने दी रास्ते में, किसी पंछी की आवाज भी नही सुनाई दी। देखा भगवान भी मुझे वो सब दिलाना चाहते हैं, तभी तो मेरे रास्ते की अङचने भी हटा दी। फिर तो मुझे सब-कुछ मिलेगा ही ना। मैं फिर से खुशी से झूम उठी और फिर से नई फूर्ती के साथ आगे बढने लगी।
पर अचानक मेरी आँखें धूल के थपेङों से फिर से बंद हो गई। ओफ्फोह ये धूल भी ना! अब आँखें कैसे खोलूँ? अरे हाँ,... पानी की छीटें आँखों पर मारुँगी तो आँखें आसानी से खुल जाएँगी। आँखों को ठंडक भी तो मिलेगी! ठंडक से याद आया हवाओं में तपिश क्यूँ है? मुझे जलन सी क्यूँ हो रही है? मेरा दिल झमझमा क्यूँ रहा है? एक ये आँखें पहले इनको पानी से धो लेती हूँ। पानी से याद आया मुझे तो प्यास लगी है। प्यास से दिल झमझमा रहा है मेरा। पागल दिल इशारे कर रहा है बता नही रहा उसे क्या चाहिए।
                प्यास लगी है ना, तो बस इतनी सी बात है। लो अभी पानी पी लेते हैं पहले। पानी........................??  पानी से कुछ याद नहीं आ रहा कि पानी से क्या? ए दिल! कुछ देर शांत हो जा! तभी तो मुझे याद आएगा कि पानी से क्या? अरे हाँ....., पर पानी है कहाँ? यही तो याद नहीं आ रहा था, पानी तो चाहिए पर पानी है कहाँ?        पानी.....................पानी.......................पानी।
                अब दिल और भी तेजी से झमझमाने लगा। पानी है कहाँ......???? इस सवाल ने आँखों की रङक और गले की प्यास को और बढा दिया। मैंने खुद को समझाने का कोशिश की- अरे जब मुझे सबकुछ मिल रहा है तो पानी भी तो मिलेगा ना।

              दिमाग ने अंतत: अपनी चुप्पी तोङ ही दी- एक ही बात बार-बार मत दोहरा। पहले तो तु ये बता तेरा ये सबकुछ है क्या?
                दिल ने झट से खुश होकर कहा- लो जी करलो बात!  ये सबकुछ पर ही अटका पङा है। अरे सबकुछ है............................................................???  हाँ सबकुछ..................ये तो मैने सोचा ही नही । ये सबकुछ क्या है?? क्या सबकुछ चाहिए मुझे??
               इस नए सवाल ने तो मेरे होश ही उङा दिए। मैं पता नहीं कहाँ चली आई किसी सबकुछ के पीछे?? मैं इतनी बङी बेवकूफ क्यूँ हूँ?? मैं कभी कुछ ठीक क्यूँ नहीं करती??  मैं इतनी गैरजिम्मेदार क्यूँ हूँ? अब मैं कहाँ जाऊँ? क्या ढूंडु? किसे पुकारुँ??  एक तो प्यास से जान निकली जा रही है और अब तो घबराहट के मारे पूरे शरीर में कंपकंपी होने लगी है।
             मैं चिल्लाई, जोर-जोर से चिल्लाई- कोई है....?.क्या कोई सुन रहा है??.. कोई तो जवाब दो?? कोई है.......कोई है......कोई है??????..... कहते-कहते मैं अपने घुटनो के बल बैठकर जोर-जोर से रोने लगी।
पर इस तरह रोने से प्यास और भी बढ गई। दिल से और तेज आवाजें आने लगी-पानी ... पानी, मुझे तो बस पानी चाहिए। पानी मिल गया तो सब-कुछ मिल जाएगा। पानी ही सब-कुछ है!
दिमाग जोर से चिल्लाया-अपनी झूठी चाहतों के पीछे दौङाता है और सब-कुछ बर्बाद कर देता है। तेरे इस सबकुछ के पीछे भागते-भागते आज कुछ भी पास नहीं है। उन काँटों ने कितना अहसास दिलाना चाहा वापिस लौट जाओ, आगे सिवाए बिन माँगी मौत के कुछ नही मिलेगा। झाङियों ने कितना रोकना चाहा- आगे हमारी छाया भी नसीब नही होगी। पंछियों की आवाजों ने कितना टोका- आगे कोई तुम्हारी मदद की गुहार नही सुन पाएगा।
               आगे तरस जाओगी किसी की आवाज सुनने के लिए, ठोकर लगने के लिए, काँटों के चुभने के लिए और झाङियों में उलझने के लिए।
              पर तू तो सब-कुछ पाने चला था ना!  तू कहाँ किसी की सुनता। सबकुछ के चक्कर में आज जो भी था वो भी ना रहने दिया।
             अब तू ऐसे ही प्यासी मरेगी। एसे ही तङपेगी। यहाँ तो बादल भी नहीं बरसेंगे कभी। ओह! ऊपर वाले क्या माँगू तुझसे?  मरना तो है ही शायद अब, बस एक घूट ही दिला दे। बस एक घूँट, ज्यादा कुछ नही माँग रही। उससे कम से कम मेरी मौत तो प्यासी नहीं रहेगी। ये कहकर दिमाग दहाङें मारकर रोने लगा।
              दिल भी ना रोक सका खुद को, वो भी रोने लगा। इन दोनों की रुलाई से मेरी घबराहट भी चीत्कारों में बदल गई। हाँ मैं रो रही थी, जोर-जोर से रो रही थी। गले की आवाज सूख गई थी और आँखों से आँसु भी ना आए क्योंकि आँखों का पानी घुसे रेत ने पी लिया, वो भी तो बरसों से प्यासा था। पता नहीं जिंदगी में ऐसा गीला अहसास उसको कभी हुआ भी होगा या नही??
             दिमाग फिर से चिल्लाया- ये सब तेरी वजह से है दिल, सिर्फ तेरी वजह से। काश तू उन झूठे छलावों के पीछे ना भागा होता तो आज ये दिन ना देखना पङता! तूने हमें कहीं का नही छोङा। अब क्या करें?  कुछ समझ नहीं आ रहा।
            दिल इस बार-बार की तानाकशी से तंग आकर बोला- क्या सपने देखना गलत है? मेरी गलती तो बस इतनी है ना कि मैनें एक सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए एक रास्ता चुना। मैनें किसी का बुरा तो नही किया ना, बल्कि मैने तो किसी का बुरा सोचा तक नही, फिर मेरे साथ बुरा क्यूँ हुआ? मेरे वश में और था भी क्या?  मैं तो सिर्फ कोशिश कर सकती थी ना । मैं इस बात का अंदाजा कैसे लगा सकती हूँ कि किस रास्ते का अंजाम क्या होगा। मगर मुझे एक बात  बता दिमाग-जब तुझे ये सब कुछ पहले से ही पता था तो तु पहले कहाँ था?  पहले क्यूँ नही बोला? तब एक भी बार क्यूँ नही रोका मुझे तुमने? अब क्यूँ बार-बार ताने दे रहा है?  अब क्यूँ बङा बन रहा है?
                 दिल की ये बात सुनकर दिमाग को एक झटका सा लगा, अचानक से वो समझ आ गया जिसकी तरफ उसका ध्यान ही नही गया था। ये समझ आते ही सुन्न हो गया दिमाग और ये अहसास हुआ - वो भी बराबर का जिम्मेवार है जो भी हुआ उसमें।
               दिमाग ने अपनी गलती मानी और कहा- तो अब क्या करें। कुछ भी समझ नहीं आ रहा। कहाँ जाएं?  क्या करे? किसको पुकारें??  कौन सुनेगा हमारी पुकार?? हमें भी तब समझ आया है जब सब खत्म होने वाला है।
दिल ने रुआँसे सुर में कहा - अब किया भी क्या जा सकता है? सिवाय इस इंतजार के कि कौनसा पल हमारा आखिरी पल होगा। क्या कभी सोचा था ऐसा भी एक वक्त आएगा,समय रेत की तरह हाथों से फिसलता चला जाएगा, उसको पकङने की जितनी कोशिश करेंगे उतना ही और भी तेजी से वो फिसलेगा।उसे तो हर हाल में फिसलना ही है चाहे पकङने की कोशिश करो या नही, तो ऐसे में किया भी क्या जा सकता है।अब तो बस..............  बस...... सब खत्म ही होगा।
            इस बात पर अचानक दिमाग चहकते हुए बोला- जब सब खत्म होना ही है और वक्त को गुजरना ही है तो क्या पता ये सब खत्म हो जाए और ये बुरा वक्त गुजर जाए..............????
             दिल ने जवाब दिया-  हा-हा....। अब तू वही गलती कर रहा है जो मैंने की थी। भ्रम में मत रह। मेरे लिए तो जिंदगी अब समझ से बाहर की बात हो गई है। क्या करें क्या नही कुछ समझ में ही नही आता। कोरे ख्वाब मत देख तकलीफ के अलावा कुछ नही मिलेगा। अब बस कर!  मुझे इन बातों पर और खुद पर गुस्सा आता है।
           दिमाग फिर से बोला- अरे तू मेरी बात समझ एक बार; देख अगर हम ऐसे ही हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहे तब भी यही हाल होना है और अगर हम इस हालात को बदलने की कोशिश करते हैं तो दो बातें हो सकती हैं - एक तो कुछ नहीं बदलेगा, और अंत यही होना है, तो वो तो वैसे भी यही होना है।
और दूसरा...???? - दिल ने जिज्ञासा में पूछा।
ये कि शायद कम से कम ऐसा अंत तो ना हो.....!- दिमाग ने जवाब दिया।
                     बात तो तुम ठीक कह रहे हो। दिल ने भी हामी भरते हुए कहा। तो चलो फिर करते हैं कोशिश एक बार ओर या फिर आखिरी बार।
                      दिल और दिमाग जब एकमत हो गए तो मुझे भी ढाढस हुआ और एक नई ऊर्जा से फिर से कदम आगे बढाए।
              चेहरे पर एक संतुष्टी झलक रही थी, कदमों में दृढता थी और दिल में एक इरादा, पर कोई खौफ ना था क्योंकि अंजाम का कोई डर जो अब नही था।
             हाँ, एक बात जरुर समझ में आ गई कि जीवन में कभी हार नही माननी चाहिए, क्योंकि हार मानने से भी कहाँ कुछ बदलेगा। हो सकता है कोशिश करने पर भी कुछ ना बदले पर कम से कम सर झुकाकर तो अपने अंजाम का सामना नहीं करना पङेगा।
                     कदम बढते जा रहे थे, नजरें धुँधली होती जा रही थी पर हौंसला नहीं थका था। अब आँखों के आगे अँधेरा छाता जा रहा था और अचानक चक्कर आया, मैं धङाम से गिर गई और बेहोश हो गई। कुछ गीला- गीला अहसास हुआ तो कुछ होश सँभला और मुँह से निकला--पानी।

                                               

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