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इंसानियत

                    
2013 का फरवरी का महीना था। रात के 9 से ज्यादा ही समय हो गया था। माधवी का सरकारी नौकरी के लिए पेपर था आज। 5:30 तक तो पेपर का ही समय था, ऊपर से परिक्षा केंद्र उसके घर से 2 घंटे की दूरी पर था । दिल्ली में रहती है माधवी और शाम के वक्त दिल्ली में लगने वाले ट्रैफिक जाम से हर दिल्लीवासी वाकिफ है। हर जगह मैट्रो भी कहाँ जाती है। तभी तो 3 घंटे हो गए थे वो अभी तक घऱ नहीं पहुँची थी।
                    उसे बस बदलनी थी, तो बस स्टॅाप पर उतर गई जो उसके घर से 4-5 कि.मी. दूर था। थोङा सुनसान इलाका था और इस पहर आॅटोरिक्शा या रिक्शा भी बहुत कम ही नजर आती हैं। रात के अंधेरे में अकेले उसमें बैठने में भी डर लगता है । "बस ही ठीक है", उसने सोचा।

                   ज्यादा लोग नहीं थे बस स्टॅाप पर। उसके अलावा तीन लङके और एक बुजुर्ग थे बस। शुरुआत में तो वो एकदम सहज थी,उसने अपने आस-पास खङे लोगों पर ध्यान तो दिया पर ज्यादा सोचा नहीं। 10-15 मिनट हो गए थे उसे बस का इंतजार करते हुए। अचानक से उसे महसूस हुअा कि वो तीनों लङके उसकी तरफ देखकर कुछ काना-फूसी कर रहे हैं।
                   अब उसे थोङा डर लगने लगा था उन तीन लङकों की मौजुदगी से, खासकर 2012 की उस घटना के बाद से तो ना चाहते हुए भी शक जैसे सबके दिलों में घर ही कर गया था।
                    माधवी को घबराहट होने लगी थी। वो अपने हाव-भाव में जरा अकङ ले आई ताकि उन लङकों को दिखा सके कि वो घबरा नहीं रही है। जिससे कि एक निडर संदेश पहुँचे उन लङकों तक और हो सकता है इससे उन लङकों के ईरादों में कुछ ढील पङ जाए।

                   पर हो कुछ उल्टा ही रहा था। उन लड़कों की खुसर-फुसर बढ गई और साथ ही साथ वो तीनों माधवी के थोड़ा और करीब भी हो चले थे। ये देखकर माधवी डर गई और उसका दिल जोर-जोर से धक-धक करने लगा। उसे उसका डर और शक सच होते लगने लगे। ये रात का अंधेरा और ऊपर से वो बुजुर्ग आदमी भी किसी बाइक वाले के साथ बैठकर चले गए।
                  वो बार-बार उन लङकों को ही देख रही थी और वो लङके उसे और साथ ही साथ कुछ फुसफुसा भी रहे थे। उसका चेहरा बेचैनी और घबराहट में गरम हो चला था। माथे पर परेशानी से पसीना आना शुरू हो गया था। मन ही मन सिस्टम और पुलिस को बुरा-भला कह रही थी, महिलाओं की सुरक्षा की तरफ उचित ध्यान ना देने के लिए और साथ ही साथ भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि उसे किसी तरह सही-सलामत घर पहुँचा दें।
                  उस पल उसे महसूस हुआ जिन लङकियों के साथ कुछ बुरा होता है उन पर क्या गुजरती होगी...! वो बार-बार भगवान से प्रार्थना करती हुई सोचने लगी -" क्या करे...? किसे मदद के लिए बुलाए....? भाई तो आॅफिस के काम से बाहर गए हैं 4 दिन के लिए और पापा दादा-दादी से मिलने गांव गए हैं और रात को 11 बजे तक लौटेंगे।" ऊधर वो लङके उसके और पास आ गए थे।
                 "तो और फिर किसको बुलाए मदद के लिए.....?"- वो इसी ऊधेङ-बुन में गुम थी कि तभी उनमें से एक लङके की आवाज आई-"मैम....! आपको कहाँ जाना है..?? वो ह........। "
                 उनकी बात बीच में ही काटते हुए माधवी बङे रूखे रवैये से बोली-" मुझे चाहे कहीं जाना हो,,....आपसे मतलब..?"
                  उनमें से एक लङका थोङा हकलाते हुआ सा कहने लगा- "वो अंधेरा बहुत है ना... तो आप.... डरना मत.... हम आपको सुरक्षित आपके घर पहुँचने में मदद कर सकते हैं अगर आप........।"
                  "अपने काम से काम रखिए...। मुझे पता है मुझे कहाँ जाना है और कैसे जाना है...!" - माधवी ने उनकी बात काटते हुए कङे शब्दों में कहा।
                 " देखा मैने कहा था ना वो गलत समझेगी.....! किसी का कितना ही भला सोच लो, लोग उसे गलत नजरों से ही देखते हैं। चला था इंसानियत का फर्ज निभाने...! अब निभा ना, बोल ना कुछ अब,,,? कहां तू इन मोहतरमा को सुरक्षित घर छोङने की भलाई की सोच रहा था, कहाँ वो उल्टा हमें कोई गुंडा-मव्वाली समझ बैठी है...! अब बोल क्या करें..?"- वो लङके आपस में कहते हुए सुनाई दिए माधवी को।
                 माधवी की साँसे उखङने लगी थी, पूरा बदन गुस्से औऱ डर से तपने लगा था। हाथ-पैर घबराहट और खौफ से काँपने लगे थे। पसीने छूटने लगे थे, तभी उसके मन में आया-" क्यूँ ना पुलिस को फोन कर दूँ...?"- ये सोचकर अपना फोन निकाला और उसका लाॅक खोलने लगी कि तभी बस आ गई।
                वो भागकर बस में चढ गई। बस में चढकर चैन की सांस ली, आँखें मूँदकर भगवान का शुक्रिया अदा किया और सुरक्षित होने के एहसास से एक हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई।
               लंबी-लंबी और गहरी सांसे लेते हुए उसकी नजर पीछे गई तो उसने देखा वो तीनों लङके भी इसी बस में थे। उसका दिल धक् से रह गया। उसने देखा बस में भीङ ठीक थी, डर वाली बात नहीं है शायद। पर क्या पता ये हथियार दिखाकर, उठाकर ले गए तो....!! माधवी बहुत घबरा गई और ऐसा सोच ही रही थी कि तभी उसका बस-स्टाॅप आ गया।
                वो जल्दी से बस से उतरी, एक बार पीछे मुङकर देखा, जब यकीन हो गया कि कोई नहीं है तो एकदम से भागी और सीधा घर जाकर ही रुकी।
                घऱ जाकर, कल बताऊँगी, ये सोचकर किसी से इस बात का जिक्र नहीं किया। खाना-पीना करने के बाद जब सोने के लिए शांति से अपने कमरे में लेटी तो ये पूरा घटनाक्रम उसकी आँखों के आगे घूमने लगा। सब बातें कानों में गूँजने लगी।
              उसे अब जाकर उन लङकों की बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी। जब बार-बार उन बातों पर विचार किया तो उसे साफ-साफ समझ आया कि वो लङके सच में उसकी मदद ही करना चाहते थे पर उसने उनको एकदम ही उल्टा समझ लिया।
               उसे अफसोस हुआ अपने रवैये पर। उसने सोचा उनका शुक्रिया अदा करने की बजाय मैंने उनको बुरा- भला सुना दिया। मेरे इस व्यवहार से सबक लेकर वो अब शायद ही किसी की मदद करेंगे। मैने ये अच्छा नहीं किया।
               पर मैं भी क्या करती आए दिन अखबार में ऐसी-वैसी खबरें पढकर हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि मदद में उठे हाथ भी हमें क़ातिल हाथ नजर आते हैं। इसी विचारधारा के वशीभूत होकर मैंने भी उनकी नेकदिल कोशिश को समझने की बजाय वो समझा जो रोज अखबारों में पढते हैं।
              बड़े अफसोस की बात है यार....! पर उससे भी बुरी बात ये है कि मैं अपनी गलती सुधार भी नही सकती माफी मांग कर। पता नहीं जिंदगी में कभी उन लड़कों से मिल भी पाउँगी या नहीं, मिले भी तो पहचान ही नहीं पाउँगी शायद।
              हाँ, अपने आप से एक वादा करती हूँ आज, अगर मेरे सामने भी ऐसे ही कोई हालात हुए कभी, तो मैं भी इंसानियत जरूर दिखाउँगी और मदद पक्का करुँगी। क्योंकि मैं भी एक बात समझ गई अच्छे से कि दुनिया में अच्छे इंसान भी हैं और इंसानियत भी जिंदा है।
               ये सोचते-सोचते माधवी मीठी नींद सो गई।
 




नर-नारी या जीवनसाथी

                                         
   र बड़े स्नेह से उसका हाथ पकड़कर आगे-आगे चल पड़ा तो री उसके पीछे-पीछे मुस्कराती हुई, धीरे-धीरे चल रही थी। र, री की चाल के अनुसार ही चल रहा था। पहला अनुभव था तो री थोड़ा शरमा रही थी, पर खुश थी। र का उसका हाथ पकड़कर चलना उसे अच्छा लग रहा था।
               वो बार-बार पीछे मुड़कर देखता तो वह भी उसकी तरफ देखती, दोनों की नजरें  मिलती और दोनों मुस्करा देते।
              ऐसे ही चलते-चलते समय गुजरता गया।

             और जैसा कि बदलने की तो वक्त की फितरत ही होती है, वैसे ही जीवन के रंग-ढंग के मुताबिक, उनका रवैया भी अब बदलने लगा था।
              र की चाल ने गति पकङ ली और हाथ की पकङ में स्नेह की ढील की बजाय अधिकार की जकङ आने लगी थी, ऊधर री को अब ये नया अनुभव, उसके हाथ की पकङ, किसी सजा की तरह महसूस सी होने लगी थी।
             शुरुआत में तो री ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया, पर फिर ये जकङ उसे धीरे-धीरे अखरने लगी और उसके दिल में नाराजगी का बीज बोती चली गई। उसे महसूस होने लगा जैसे वो जेल में बंद है और र को अब उसकी परवाह ही नहीं रही। उसे सिर्फ अपने अधिकारों की पङी है, उसके जज्बातों की कोई कदर ही नही है।
             इस सोच से उसमें एक उदासीनता छा गई और उसकी चाल धीमी हो गई, जिससे उन दोनों की चाल का तालमेल बिगङने लगा।
            अब र को शिकायत होने लगी कि वो उसकी चाल के अनुसार अपनी चाल में बदलाव क्यूँ नही ला रही। वो बार-बार उसको अपनी चाल से तालमेल करने को कहता, कुछ देर अपनी चाल को धीमे भी करता। पर फिर कुछ समय बाद उनका तालमेल बिगड़ जाता, तो वो इस बार-बार के कहने-कहाने से तंग होकर उससे नाराज रहने लगा। उसे शिकायत रहने लगी कि वो उसके साथ-साथ क्यूँ नहीं चलती।
            ऐसे ही अपनी-अपनी नाराजगी में वो एक-दूसरे से खफा-खफा से आगे बढ़ने लगे। वो एक-दूसरे को देख भी तो नहीं पा रहे थे, जो एक-दूसरे का चेहरा देखकर भावनाओं को समझने की कोशिश करते तो।
            र पीछे मुड़कर देखने में अपनी बेइज्जती मानने लगा, तो जब कभी देखता भी तो री को भी उसकी तरफ देखने में अपनी बेइज्जती लगती। दोनों एक दूसरे से खफा, बिना बोले और अपनी-अपनी जिद् में आगे बढते रहे, वक्त कटता रहा।
           दोनों एक-दूसरे को ना देख कर दाएँ-बाएँ देखते हुए चलते रहे।
           री ने दाएँ तरफ देखा कि कोई र अपनी री से बार-बार पीछे मुड़कर पूछ रहा था, उसका ख्याल कर रहा था। कुछ भी करने से पहले उसकी राय जरूर लेता था। इस बात पर उसका गुस्सा और भी बढ गया कि उसका र तो उससे कुछ पूछना तो दूर, उल्टा उस पर अपनी मर्जी थोपता रहता है। अपनी भावनाओं के बारे में बताओ तो उल्टा डाँट देता है।
           उसका भी मन करता है कि कभी वो अपनी मर्जी से चले पर ऐसा करने के लिए र को पीछे आना पड़ता। पर समाज का तो यही नियम था कि र हमेशा आगे चलते हैं और री उनके पीछे-पीछे।

           पर ऐसा क्यों है? -ये सवाल उसका मन बार-बार करता।                                     
           इस बात पर उसका मन हुआ, अभी अपना हाथ छुड़ा कर भाग  जाए कहीं दूर और अचानक से हाथ छुड़वाने के लिए एक झटका दिया जिससे र के हाथ की पकड़ ढीली पड़ गई।
           पर फिर तुरंत र ने उसका हाथ जोर से पकड़ लिया।
           ऊधर जब र ने बाँए तरफ देखा कि कोई री अपने र की चाल के मुताबिक धीरे और तेज हो रही थी तो उसकी नाराजगी की कोई सीमा ना रही। फिर मेरी री क्यूँ इतने नखरे और अकड़ दिखा रही है, इसकी तरह मुझसे लय मिलाकर क्यूँ नहीं चल रही?? - ये सोचते हुए उसने गुस्से में री के हाथ को और भी जोर से जकड़ दिया।
           इस पकड़ से री का हाथ दर्द करने लगा और उस ने फिर हाथ छुङाने की कोशिश की पर र ने फिर जोर से हाथ पकङ लिया।
          र को ये सब साथ सफर के लिए अहम लगता था, तो री को ये सब अपने ऊपर होने वाला अत्याचार।
          र को उसका रवैया अङियल और जिद्दी लगता था, वही री को अपनी तकलीफ जताने का एक माध्यम।
          अपनी-अपनी विचारधारा और आंकलन ने उनके बीच की दूरियाँ औऱ भी बढा दी।

          र ने री को उसके अङियलपन का ताना दिया और अपनी दाई तरफ दिखाया कि कैसे एक र अपनी री को जिद् करने पर घसीटते हुए लेकर जा रहा था और उसकी बात ना मानने पर उसके साथ हाथा-पाई भी कर रहा था। उसने कहा देख ऐसे र भी होते हैं, पर वो उसके साथ ऐसा कभी नहीं करता, पर फिर भी वह उसकी कदर नहीं करती।
          री ने भी उसे बाई और एक री को दिखाया जो अपने र को अपनी मर्जी से चला रही थी और साथ ही में एक दूसरे र का हाथ पकङकर चल रही थी। उसने कहा कि देखो ऐसी री भी होती हैं। पर वो तो ऐसा करना तो दूर सोच भी नही सकती और फिर भी वो उसकी परवाह नही करता- कहते हुए री ने फिर से अपना हाथ छुङवाने की कोशिश की और इस बार कामयाब भी हो गई।
        उसकी इस हरकत पर र एकदम से सन्न रह गया।
        तभी अचानक इसी कहने-सुनने के दौरान उन्होने एक र और री को देखा जो हाथों की ऊँगलियों में ऊँगली डालकर आगे-पीछे नही बल्कि एक साथ चल रहे थे।
         दोनों एकदम से चुप हो गए औऱ सोचने लगे कि क्यूँ ना एक बार ये आपसी मतभेद भुलाकर, ऐसे चलकर देखा जाए...!!
           दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा जैसे एक-दूसरे के मन की बात की थाह लेना चाहते हों और फिर ऐसे ही चल पङे।
          साथ-साथ चलने से अब दोनों बङी आसानी से एक-दूसरे का चेहरा देखकर भावनाओं को अंदाजा लगा पा रहे थे। जब भी दोनों में से किसी को एक-दूसरे की दिशा में कुछ देखना होता तो दोनो बङी आसानी से बिना किसी झिझक के एक-दूसरे की दिशा बदल लेते और एक-दूसरे को नजरिया समझ पाते। इस बात से समाज के बनाए नियमों की अवहेलना भी नही हो रही थी।
         दोनों एक-दूसरे की पकङ के दर्द का अंदाजा भी आसानी से लगा पा रहे थे तो बड़े स्नेह और आदर से एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे। अब दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करने लगे थे। जिससे दोनों के बीच की खाईयाँ पटने लगी थी।

          ऐसे ही दोनों को साथ चलते-चलते एक अरसा गुजर गया। इस लंबे एक साथ गुजरे अरसे से दोनों को एक बात समझ आई कि हम इंसान अपना ज्यादातर समय र और री के रोने-धोने में गुजार देते हैं, इसके बजाय अगर हम ये वक्त एक साथ मिल-जुल कर गुजारें तो जीवन कहीं ज्यादा सुखद
और सार्थक लगता है।
         अगर हम नर और नारी के अस्तित्व के लिए लड़ने की बजाय, ऊपरवाले के बनाए हुए साथ मिलकर चलने के संगी-साथी की तरह रहें, तो हर दुख-सुख भी कितना शांतिमय और अर्थपूर्ण लगने लगता है। जीवन का हर रंग एक-दूसरे की एक-दूसरे के लिए चाहत और महत्व समझा कर जाता है।




भविष्यवाणी


"पंडित जी..! बताइए ना, हमारे बेटे का भविष्य कैसा होगा..? वो क्या बनेगा जीवन में..? "-नवजात शिशु के माता-पिता ने बङी उत्सुकता से अपने बेटे के नामकरण संस्कार के लिए आए हुए पंडित जी से पूछा।
               "जरा रूकिए..! अभी बताए देते हैं। ये हो गई सारी जानकारी आपके बेटे की - जन्म तिथि, जन्म-समय,राशि । अच्छा तो सारी जानकारी के अनुसार,...... एक मिनट......................... हाँ जी तो सारी जानकारी के अनुसार - वाह क्या बात है..! आपका बेटा तो बङा भाग्यशाली है। किस्मत बहुत अच्छी है आपके बेटे की । जीवन में वो बहुत बङा आदमी बनेगा, हर तरफ गाङियाँ ही गाङियाँ होंगी उसके। बहुत कम लोग होते हैं इतने भाग्यशाली।" पंडित जी ने खुश होते हुए बताया ।
" बहुत-बहुत धन्यवाद पंडित जी।" नवजात शिशु के माता-पिता ने खुशी-खुशी पंडित जी को मुँहमाँगी दक्षिणा देते हुए कहा।
               समय का पहिया चलता गया और नवजात शिशु बङा होकर स्कूल जाने लगा। फिर धीरे-धीरे उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी कक्षा भी बढती गई। पढने में ज्यादा ध्यान नहीं था उसका।
              कभी जो कोई उनके बेटे की शिकायत करता कि आपका बेटा सारा दिन खेलता रहता है, कभी पढता हुआ तो दिखता ही नहीं। तो माता-पिता बङे गर्व से हमेशा सबको यही कहते -"अरे बहुत किस्मतवाला है हमारा बेटा..! बहुत बङा आदमी बनेगा। पंडित जी ने बताया था गाङियाँ ही गाङियाँ होंगी इसके हर तरफ। कहते हैं ना, जिसके भाग्य में जो लिखा होता है वो तो उसको मिलता ही है। चाहे ये कुछ करे या नहीं, हमारे बेटे को भी वो सब तो मिलेगा ही जो इसके भाग्य में लिखा हुआ है।"
             गिरते-पङते उनके बेटे ने किसी तरह बारहवीं तो पास कर ही ली।
             कुछ सालों बाद अङोसी-पङोसी और सब जानने वाले पंडित जी की भविष्यवाणी अक्षरशः सच हुआ देखकर हैरान रह गए। सच में उसके चारों ओर गाङियाँ ही गाङियाँ थी।
            दरअसल वो सिपाही लगा था ट्रैफिक पुलिस में और हर रोज चौराहे पर खङा होकर गाङियों को दिशा-निर्देश देता था। सच में ही उसके हर तरफ गाङियाँ ही गाङियाँ होती हैं, जो उसके ईशारों पर ही चलती हैं। क्या भविष्यवाणी की थी पंडित जी ने..!!!

ऊँच-नीच

प्यारी माँ,
            याद है आपको, उस दिन जब मैं शीतल के घर मेरी किताब लेने जा रही थी, बिना दुपट्टे, तो आपने क्या कहा था- यही बेशरमी तो लङको को बुलावा देती है और कुछ ऊँच-नीच हो जाती है। अपने भाई के साथ जाना, जमाना बङा खराब है, अकेली लङकी के साथ कौन क्या करदे, क्या भरोसा किसी का! लङकी को अकेले घर से बाहर नही जाना चाहिए, बाहर दुनिया बहुत बुरी है। समझी! तब इस ऊँच-नीच का मतलब ठीक से कहाँ समझ आया था मुझे।
                                       पर माँ उस रात तो मैंने कपङे भी एकदम सही पहने थे, दुपट्टा भी ओढा हुआ था। मैंने तो स्कूल से आने के बाद एक बार घर से बाहर झाँका तक नहीं। भाई भी घर पर ही था, फिर मेरे साथ ये ऊँच-नीच क्यूँ हुई माँ?? मुझसे क्या गलती हो गई थी माँ??
                               पता है माँ मुझे बहुत दर्द हो रहा है और उससे भी ज्यादा घिन्न आ रही है, जो हुआ उसको याद कर-करके। वो सब मेरी आँखों के आगे घुम रहा है। मुझे अपने ही शरीर से नफरत हो गई है। छीः.......!! वो सब कितना गन्दा था माँ! सबकुछ गन्दा लग रहा है मुझको-सारी दुनिया गन्दी लग रही है और आप सब भी। तब ये क्यूँ नही बताया माँ घरवाले भी बुरे होते हैं?
                              फिर भी आपने उनको कुछ क्यूँ नही कहा......?? उल्टा मुझे ही मारकर चुप करा दिया। मैंने क्या किया था, मेरा क्या कसुर था?? आपने मुझसे ठीक से बात भी नहीं की।
                              मुझसे नही सहन हो रही ये तकलीफ, ये दर्द और आप लोगों की ये नजरअंदाजी, आपका गुस्सा! आखिर मैने किया ही क्या था माँ? मैं ऐसे नही जी सकती। इसलिए जा रही हूँ सबसे दूर। मेरे कितने सपने थे माँ। बङा अफसर बनना चाहती थी- बुरे लोगों को सजा दिलाना चाहती थी, पर मैं तो अपने ही घर के बुरे आदमियों को ही नही पहचान पाई। बाहरवालो  को कैसे पहचानती भला?
                          माँ आप तो मेरी तकलीफ को समझती ना। बस एक बार तो मुझे सीने से लगा लेती माँ। मैं कैसे भी जी लेती। पर आपने तो मुझे कितना डाँटा, कितना मारा। मुझे तो मेरी गलती का भी नही पता। आपने मेरे साथ ऐसा क्यूं किया माँ??
                             बस अब मैं नही जी सकती। मैं जा रही हूँ। मेरे जाने से भी आप सबको कोई फर्क नही पङेगा ना। पर आप लोगों की ईज्जत तो बच जाएगी। यही तो कह रही थी ना आप - तू मर जाती तो अच्छा होता। तो मैं मर रही हूँ माँ। आपकी बात मान ली मैंने, क्योंकि मैं तो आपकी अच्छी बेटी हूँ ना। पर आप अच्छी नही हो, आप बहुत बुरी  माँ हो, दुनिया की सबसे बुरी माँ!
                       मुझे नही पता दुनिया कैसी थी, आपने कभी देखने ही नही दी। पर मेरे घरवाले बहुत बुरे हैं तो दुनिया तो और भी बुरी होगी शायद। अब तो देखनी भी नही दुनिया ।मैं इस दुनिया में वापिस कभी नही आऊँगी, कभी भी नहीं।
                  आप सबको तो शायद माफ कर दू पर पापा को  कभी नही उनको तो भगवान भी माफ नही करेगा।
             


भगवान ऐसा बाप किसी को ना दे। बहुत नफरत करती हूँ मैं उनसे, इतनी ज्यादा की बता भी नही सकती, मरकर भी करती रहूँगी।

आखिरी बार -- bye माँ, सबको bye।।








माँ ने अपने आँसु झटपट पोंछे और उस खत को रसोई में जाकर जला दिया ताकि किसी को वो खत ना मिले। उसकी मौत का बहाना भी सोच लिया था लोगों के आने से पहले ही।।।।

जमाना खराब है

दुकानदार ने नए ग्राहक से पूछा-"हाँ जी मैडम! बोलिए, क्या चाहिए आपको?"

" जी, मैं कुछ लेने नही देने आई हूँ।" ये कहते-कहते नई ग्राहक पर्स से पैसे निकालने लगी-"आपको अगर याद हो तो, क्योंकि बहुत समय हो गया उन बातों को। मैं, अपने माँ-पापा, भाई-भाभी और दो बच्चों के साथ दीवाली की खरीदारी करने आए थे आपकी दुकान पर। उस दिन बहुत भीङ थी आपकी दुकान पर। हमारे दोनों बच्चे आपकी दुकान पर रखे खिलौनों को देखकर बहुत मचल गए थे और बहुत रोने लगे थे ,तो हमको दो खिलौने लेने पङे थे। एक खिलौने का दाम 90 रुपए था। तो कुल 180 रुपए हुए ,मैं वो लौटाने आई हुँ।"

 दुकानदार ने एकदम से कहा- "और वो खिलौने दो बङी कारें थी।"

"हाँ जी,वो दरअसल हमने जब घर जाकर देखा कि क्या-क्या लाए हैं और जब सब पैसों का हिसाब लगाया तो पता चला उन खिलौनों के पैसे तो दिए ही नही।" नई ग्राहक ने बताया।

"क्या बात है मैडम!"- दुकानदार की पत्नी ने हैरानी और खुशी के मिले-जुले भाव में कहा- "आप इतने दिनों बाद भी, वो पैसे लौटाने आए हो। ऐसा ग्राहक पहली बार देखा है हमने। हाँ ऐसे ग्राहक जरुर देखे थे, जो पुराना माल हमने एक तरफ रखा है ना,उसको आँख बचाकर उठा कर ले जाते हैं। लोग सही कहते हैं-दुनिया में ईमानदार लोग भी होते हैं, इतने साल काम करते हुए हो गए ,पर देखा आज पहली बार है। आप कुछ लो ना मैडम जी।"

"नहीं मैं तो बस पैसे लौटाने आई थी।सब कहते हैं जमाना बङा खराब है,पर जमाना तो हमसे है ना।तो मैं नही चाहती कि मैं खराब जमाना बनाने में सहभागी बनूँ। बस यही काम था, मैं चलती हूँ।" नई ग्राहक ने जाते हुए कहा।


"धन्यवाद मैडम, बहुत-बहुत धन्यवाद।ये बात हमेशा याद रहेगी कि दुनिया में सिर्फ बेईमान लोग नही होते और जमाना खुद खराब नहीं होता, हम बना देते हैं। फिर से बहुत धन्यवाद।" दुकानदार ने बङे आदर के साथ कहा।

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