अधुरा सफर

ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी,
फिर क्यूँ मिली थी यूँ तकदीरें हमारी ?
      सूनापन छोङ के गए तुम जीवन में,
        तङप और बेबसी बची बस दिल में।
         सहा ना जाए हर गुजरता पल हाय!
          सूख गए आँसु, दिन-रात जो हैं बहाए।
            इस निष्ठुरता ने मार डाली मासूमियत सारी,
            ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

मरने लगी हैं अब तो सारी ही उमंगे,
 डूब गए हम तो, थम गई हैं तरंगे।
   माना मिली हैं मुझको नई मंजिलें,
     पर थमते क्यूँ नही चाहतों के ये सिलसिले ?
       मेरी हर राह पर पङ रही तेरी यादें भारी,
       ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

पहले जब हर आहट पर होती थी उम्मीदें,
  अब वक्त ने बना दी हैं उनके दरमियाँ सरहदें।
    तो क्यूँ तेरी निशानियाँ ये वक्त ना मिटा पाया ?
     और जब भी झाँका दिल में तू ही तो मिला है समाया।
        तेरे लिए इस प्यार को कैसे करूँ तुझपे बलिहारी ?
        ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।।

मेरी धङकनों में अब भी तुम जी रहे,
 हर एक पल मेरे तेरे बिछोह की पीङ पी रहे।
  क्यूँ वो रास्ते एक हो गए थे हमारे ?
    जब हम हैं एक ही नदिया के दो किनारे।
     फिर कैसे एक हो गई थी चाहतें हमारी ?
       ना तुम थे मेरे और ना मैं थी तुम्हारी।
      
फिर क्यूँ मिली थी यूँ तकदीरें हमारी ?

रब की कदर





     
सजदे रुठे हैं सारे,
माना गर्दिश में हैं सितारे,
ना थक, ना रुक
बस बढा दे तू कदम,
भुला दे हर गम,
ख्वाहिशों का जहाँ,
है माना लुटा हुआ,
फिर भी आएगा वो दिन,
जब मिलेगी तुझे मंजिल।
सबको सहने पङते हैं जख्म,
किसी को ज्यादा, किसी को कम,
ना दिखा खुद पर रहम,
वक्त लगाता आया है मरहम,
धूप से खिलती है छाया,
इसी से होने का वजूद पाया।
ये डोर कट जाएगी इक दिन,
हथेली के छाले मत गिन,
सुख-दुख है जीवन के रंग,
बिन एक के भी जहाँ बेरंग।
तो बढता जा, सँवरता जा,
विचारों को तराशता जा,
दुनिया होगी और भी बेहतर
यूँ बढेगी रब की कदर ।।

भीगी मुस्कान

















उम्मीद है कि कोई तो आहट हो
तेरी आवाज की कोई तो सुगबुगाहट हो,
इस बार तिल-तिल टूटती चाहतों का दंश ना झेल पाएँगे
इसीलिए चाहते हैं तेरे आने पर ही ख्वाबों की सजावट हो।।
पल-पल हो रहा है भारी बिन तेरे
ये डर ए खुदा! बस केवल घबराहट हो,
दिल को सजा दी है तब तक तेरा दीदारे-लज्जत ना करने की
कि जब तक मेरे दरो-दीवार पर ना तेरी कोई आहट हो।।
तू पुछे इक दिन कि आखिर बात क्या है?
इस सवाल में हक हो ना कि बनावट हो,
आए मेरी चौखट पर तु मुझे अपना बनाने को
काश! मेरी जिंदगी मे कभी वो भीगी मुस्कराहट हो।।

रुख-ए-महोब्बत












 ताउम्र जिंदा रहेंगी
                    तेरी महोब्बतें इन आँखों में,
पर अब कभी ये जिद्दी आँखें
                    तेरा दीदार ना करेंगी।
रुसवाईयां ना मिली कभी
                  तो ना मिली कभी वफा,
तेरी छाया पर भी मेरी सदाएँ,
                 हके-इजहार ना करेंगी।
घूँट-घूँट पीया था तुझे
                 मेरी रुह ने इस कदर,
कि श्मशान की आग भी
                 तुझे मुझसे बेजार ना करेंगी।
 तुझसे जुदा होकर
                पल-पल जलें हैं बेतहाशा,
पर फिर ये निगाहें
              कभी तेरा इंतजार ना करेंगी।
टुकङे-टुकङे टुट गई
              बिखरकर उम्मीदें सारी
कि अब किसी पर मेरी आहें
               यूँही ऐतबार ना करेंगी।।
जिंदा हूँ पर जीना कहाँ है,
                 टूटा हर ख्वाब ऐसे,
कि जन्नत की दरो-दिवार भी,
                    अब बेकरार ना करेंगी।।
और अब किसी पर मेरी आहें
               यूँही ऐतबार ना करेंगी।।

 

Email Subscription

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner